राष्ट्रीय / पश्चिम बंगाल / राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 22 मई 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद एक बार फिर राज्य हिंसा, राजनीतिक प्रतिशोध और सड़क पर बढ़ते टकराव की तस्वीरों से सुर्खियों में आ गया है। चुनाव परिणाम आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी कार्यकर्ताओं से “बदला नहीं, बदलाव” की अपील जरूर की थी, लेकिन जमीनी हालात इससे बिल्कुल अलग दिखाई दिए। स्वतंत्र संघर्ष निगरानी संस्था ACLED के आंकड़ों के अनुसार 4 मई से 7 मई के बीच राज्य में चुनाव बाद हिंसा की 64 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से 42 घटनाओं में बीजेपी कार्यकर्ताओं या समर्थकों की भूमिका सामने आई है। इन घटनाओं में तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों में तोड़फोड़, नेताओं और कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले, मारपीट और राजनीतिक प्रतिशोध जैसी घटनाएं शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आचार संहिता लागू होने की अवधि यानी 15 मार्च से 7 मई तक राज्य में कुल 231 हिंसक राजनीतिक घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें तृणमूल कांग्रेस से जुड़े 106 मामलों और बीजेपी से जुड़े 91 मामलों का उल्लेख किया गया है। केंद्रीय सुरक्षा बलों का नाम भी 13 घटनाओं में सामने आया है। आंकड़े यह संकेत देते हैं कि बंगाल की राजनीति में चुनाव अब केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और सड़क पर वर्चस्व की लड़ाई का रूप ले चुकी है। कई इलाकों में आगजनी, कार्यालयों में तोड़फोड़ और स्थानीय स्तर पर हिंसक झड़पों ने आम नागरिकों के बीच भय का माहौल पैदा कर दिया।
विशेष रूप से एक घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा, जिसमें मुस्लिम समुदाय की दुकानों में तोड़फोड़ किए जाने और “जय श्रीराम” के नारे लगाए जाने का उल्लेख किया गया। इस घटना के बाद विपक्षी दलों और मानवाधिकार समूहों ने आरोप लगाया कि चुनावी हिंसा अब सांप्रदायिक तनाव का रूप भी लेने लगी है। हालांकि बीजेपी नेताओं ने इन आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए कहा कि पार्टी कार्यकर्ता खुद भी हिंसा के शिकार हुए हैं और तृणमूल सरकार प्रशासन का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए कर रही है।
इस पूरे चुनावी दौर में “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” यानी SIR भी बड़ा विवाद बनकर उभरा। मतदाता सूची से नाम हटाने और कथित बहिष्कार के आरोपों को लेकर राज्यभर में 139 शांतिपूर्ण प्रदर्शन दर्ज किए गए। कई संगठनों और विपक्षी दलों ने दावा किया कि मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और प्रशासनिक पक्षपात ने जनता के भीतर गुस्सा पैदा किया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में चुनाव अब केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं रह गया, बल्कि प्रशासनिक भरोसे, पहचान की राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का भी सवाल बन चुका है।
विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल की राजनीति लंबे समय से हिंसक ध्रुवीकरण की गिरफ्त में है, लेकिन इस बार स्थिति और अधिक जटिल दिखाई दे रही है। बीजेपी की बड़ी चुनावी जीत के बाद जिस तरह से राज्य के कई हिस्सों में हिंसा की खबरें सामने आईं, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक प्रतिशोध की संस्कृति और मजबूत हो रही है। दूसरी ओर बीजेपी समर्थकों का तर्क है कि वर्षों तक हिंसा का सामना करने के बाद अब राजनीतिक समीकरण बदलने पर घटनाओं को एकतरफा तरीके से पेश किया जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग, केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्य प्रशासन की भूमिका पर भी बहस छेड़ दी है। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान प्रशासन निष्पक्ष नहीं रहा, जबकि तृणमूल कांग्रेस बीजेपी पर “बाहरी राजनीतिक आक्रामकता” के जरिए बंगाल की सामाजिक संरचना को अस्थिर करने का आरोप लगा रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार बंगाल की राजनीति में बढ़ती आक्रामकता आने वाले समय में लोकतांत्रिक संवाद को और कमजोर कर सकती है।
फिलहाल इतना साफ है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म जरूर हो गए हैं, लेकिन राजनीतिक संघर्ष अभी थमा नहीं है। राज्य में हिंसा, प्रतिशोध और सड़क पर बढ़ती राजनीतिक टकराहट यह संकेत दे रही है कि बंगाल की राजनीति अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां चुनाव परिणाम के बाद भी संघर्ष जारी रहता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या राजनीतिक दल लोकतांत्रिक संवाद की ओर लौटते हैं या बंगाल की राजनीति और अधिक ध्रुवीकृत और हिंसक होती चली जाएगी।




