राजनीति / तमिलनाडु | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई | 22 मई 2026
तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर बड़ा पुनर्संयोजन होता दिखाई दे रहा है। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता से बाहर हुई AIADMK के भीतर लंबे समय से चल रहा आंतरिक टकराव अब नए मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) सरकार में जगह न मिलने के बाद AIADMK के बागी खेमे और पार्टी महासचिव एडप्पडी के. पलानीस्वामी (EPS) गुट के बीच सुलह और पुनर्मिलन की संभावनाएं तेजी से बढ़ गई हैं। पार्टी के भीतर चल रही यह हलचल केवल संगठनात्मक मसला नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे तमिलनाडु की भविष्य की विपक्षी राजनीति और सत्ता संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार पूर्व मंत्री सी.वे. शन्मुगम, एस.पी. वेलुमणि और जी. हरि जैसे नेताओं वाला बागी गुट अब यह महसूस कर रहा है कि TVK नेतृत्व ने उन्हें सत्ता संरचना में अपेक्षित महत्व नहीं दिया। इसी के बाद AIADMK के दोनों धड़ों के बीच बैकचैनल बातचीत और मध्यस्थता की प्रक्रिया तेज हो गई है। बागी खेमे के एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि “शुरू से ही दोनों पक्षों को साथ लाने की कोशिशें चल रही थीं” और अब भी कुछ मध्यस्थ लगातार बातचीत कर रहे हैं। इस बयान ने साफ संकेत दे दिया है कि पर्दे के पीछे राजनीतिक समझौते की जमीन तैयार की जा रही है।
दरअसल, तमिलनाडु में TVK के सत्ता में आने के बाद विपक्ष की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है। AIADMK, जो कभी राज्य की सबसे प्रभावशाली द्रविड़ पार्टियों में गिनी जाती थी, अब नेतृत्व संकट, गुटबाजी और राजनीतिक दिशा को लेकर असमंजस में दिखाई दे रही है। चुनावी झटके के बाद पार्टी के भीतर यह बहस तेज हो गई कि अलग-अलग गुटों में बंटी AIADMK भविष्य में DMK और TVK जैसी ताकतों का मुकाबला नहीं कर सकती। यही कारण है कि अब पार्टी के पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संगठनात्मक एकता की मांग भी तेजी से उठ रही है।
हालांकि सुलह की संभावनाओं के बावजूद कई बड़े मतभेद अब भी कायम हैं। बागी गुट अपनी इस मांग पर अड़ा हुआ है कि पार्टी की जनरल काउंसिल की जल्द बैठक बुलाई जाए ताकि संगठनात्मक नेतृत्व और भविष्य की रणनीति पर खुली चर्चा हो सके। दूसरी ओर EPS गुट फिलहाल संगठन पर अपना नियंत्रण कमजोर करने के मूड में दिखाई नहीं देता। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दोनों पक्षों के बीच असली संघर्ष केवल पदों का नहीं, बल्कि AIADMK की राजनीतिक दिशा और भविष्य के नेतृत्व को लेकर है।
इस पूरे घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि AIADMK के दोनों गुट एकजुट हो जाते हैं, तो राज्य में विपक्षी राजनीति को नई ऊर्जा मिल सकती है। खासकर ऐसे समय में जब TVK सरकार के विस्तार, कांग्रेस और अन्य दलों की भागीदारी तथा गठबंधन राजनीति के नए समीकरण बन रहे हैं, AIADMK अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए संगठनात्मक एकता की राह पर लौट सकती है।
दिलचस्प बात यह भी है कि TVK सरकार में जगह न मिलने से बागी नेताओं के सामने राजनीतिक भविष्य का संकट खड़ा हो गया है। सत्ता में हिस्सेदारी की उम्मीद रखने वाले कई नेताओं को अब एहसास हो रहा है कि अलग राजनीतिक पहचान बनाकर लंबे समय तक टिके रहना आसान नहीं होगा। ऐसे में AIADMK में वापसी उनके लिए राजनीतिक पुनर्वास का रास्ता बन सकती है। यही वजह है कि चेन्नई के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले हफ्तों में पार्टी के भीतर कोई बड़ा समझौता या पुनर्गठन देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल AIADMK की अंदरूनी कहानी नहीं, बल्कि तमिलनाडु की व्यापक द्रविड़ राजनीति का संकेत भी है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य की राजनीति तेजी से बहुध्रुवीय हुई है और पारंपरिक दलों के सामने अपनी जमीन बचाने की चुनौती बढ़ी है। ऐसे माहौल में AIADMK यदि खुद को पुनर्गठित नहीं कर पाती, तो उसका राजनीतिक आधार और कमजोर हो सकता है। वहीं यदि पार्टी के दोनों धड़े साथ आते हैं, तो वह एक बार फिर राज्य की सत्ता राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में लौट सकती है।
फिलहाल इतना साफ है कि AIADMK के भीतर बर्फ पूरी तरह नहीं पिघली है, लेकिन संवाद के दरवाजे खुल चुके हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या यह बातचीत केवल राजनीतिक दबाव की रणनीति बनकर रह जाएगी या सचमुच तमिलनाडु की राजनीति में AIADMK की वापसी का आधार तैयार करेगी।




