राष्ट्रीय / न्यायपालिका / पश्चिम बंगाल | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 22 मई 2026
ईद-उल-अजहा से ठीक पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा निर्देश देते हुए कहा है कि वह वेस्ट बंगाल एनिमल स्लॉटर कंट्रोल एक्ट, 1950 की धारा 12 के तहत मांगी गई छूट पर 24 घंटे के भीतर फैसला ले। मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने यह आदेश उस याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें आगामी बकरीद के मद्देनजर पशु वध नियमों में विशेष छूट की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि चूंकि ईद-उल-अजहा 27 या 28 मई को मनाई जा सकती है, इसलिए राज्य सरकार को तत्काल निर्णय लेना होगा ताकि प्रशासनिक और कानूनी स्थिति स्पष्ट रह सके।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश के कई हिस्सों में बकरीद, पशु वध नियमों, सार्वजनिक व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर संवेदनशील बहस तेज हो चुकी है। पश्चिम बंगाल में भी हर वर्ष ईद-उल-अजहा के दौरान पशु कुर्बानी से जुड़े प्रशासनिक और कानूनी प्रश्न उठते रहे हैं। इस बार मामला सीधे हाई कोर्ट पहुंचने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में इसकी चर्चा और बढ़ गई है। अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि सरकार कानून के तहत उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार निर्णय ले सकती है, लेकिन फैसला समयबद्ध होना चाहिए।
वेस्ट बंगाल एनिमल स्लॉटर कंट्रोल एक्ट, 1950 की धारा 12 राज्य सरकार को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार देती है। इसी प्रावधान के तहत याचिकाकर्ताओं ने बकरीद के दौरान धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए राहत की मांग की थी। हालांकि अदालत ने फिलहाल कोई प्रत्यक्ष छूट नहीं दी, बल्कि सरकार को कानून के दायरे में रहकर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि हाई कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय सरकार को संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी निभाने के लिए कहा है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता और पशु संरक्षण कानूनों के बीच संतुलन की बहस को केंद्र में ला दिया है। समर्थकों का कहना है कि ईद-उल-अजहा इस्लामी परंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण त्योहार है, इसलिए प्रशासन को संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर कुछ संगठनों का तर्क है कि पशु वध कानूनों और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर सख्त निगरानी जरूरी है ताकि किसी प्रकार का विवाद या अवैध गतिविधि न हो।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में यह मुद्दा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका सीधा असर सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर भी पड़ता है। राज्य में पहले भी धार्मिक आयोजनों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर राजनीतिक विवाद होते रहे हैं। ऐसे में ममता बनर्जी सरकार के सामने अब चुनौती यह है कि वह ऐसा फैसला ले, जिससे कानून व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन — तीनों को साधा जा सके।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार हाई कोर्ट का आदेश यह भी संकेत देता है कि अदालतें धार्मिक मामलों में सीधे निर्णय देने के बजाय सरकारों को जवाबदेह बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। अदालत ने न तो मांग को खारिज किया और न ही तुरंत मंजूरी दी, बल्कि राज्य सरकार को निर्धारित समयसीमा में स्पष्ट रुख अपनाने को कहा। इससे अब पूरी नजर बंगाल सरकार के अगले कदम पर टिक गई है।
फिलहाल इतना साफ है कि ईद-उल-अजहा से पहले यह मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए संवेदनशील परीक्षा बन चुका है। आने वाले 24 घंटे में सरकार का फैसला यह तय करेगा कि राज्य इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया की तरह संभालता है या यह आगे व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस का कारण बनता है।




