राष्ट्रीय / लद्दाख / संवैधानिक अधिकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 मई 2026
लद्दाख में संवैधानिक अधिकारों, राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची की मांग को लेकर लंबे समय से चल रहा आंदोलन अब एक बार फिर निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। जलवायु कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक समेत लद्दाख के नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का एक बड़ा दल केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों से नई दिल्ली में आज मुलाकात करेगा। यह बैठक इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि फरवरी के बाद पहली बार लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के प्रतिनिधि औपचारिक रूप से केंद्र सरकार के साथ बातचीत की मेज पर बैठने जा रहे हैं। लद्दाख के दोनों प्रमुख सामाजिक – राजनीतिक संगठनों की यह साझा पहल अब केवल क्षेत्रीय मांग नहीं रह गई, बल्कि वह केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद पैदा हुए राजनीतिक, प्रशासनिक और पहचान संबंधी संकट का बड़ा प्रतीक बन चुकी है।
यह पूरा विवाद 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद शुरू हुआ था, जब लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा तो मिला, लेकिन विधानसभा और संवैधानिक सुरक्षा जैसे कई अधिकार उससे दूर हो गए। शुरुआत में लद्दाख के एक बड़े वर्ग ने इस फैसले का स्वागत किया था, लेकिन धीरे-धीरे स्थानीय समुदायों में यह भावना मजबूत होती गई कि दिल्ली से सीधा प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ने के बावजूद उनकी राजनीतिक भागीदारी और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण कमजोर हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में लेह और कारगिल की अलग-अलग राजनीतिक धाराएं एक साझा मंच पर आईं और उन्होंने राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा, स्थानीय भर्ती अधिकार और संसदीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा।
सोनम वांगचुक इस पूरे आंदोलन का सबसे चर्चित चेहरा बनकर उभरे हैं। जलवायु संरक्षण, हिमालयी पारिस्थितिकी और स्थानीय पहचान के मुद्दों को लगातार उठाने वाले वांगचुक ने पिछले वर्षों में कई बार भूख हड़ताल और सार्वजनिक अभियानों के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर लद्दाख के सवाल को चर्चा में बनाए रखा। मार्च 2026 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत से रिहा होने के बाद यह उनकी पहली बड़ी राजनीतिक-संवैधानिक प्रक्रिया मानी जा रही है। उनके शामिल होने से यह बैठक केवल प्रशासनिक वार्ता नहीं, बल्कि केंद्र और लद्दाखी जनभावनाओं के बीच भरोसे की परीक्षा भी बन गई है।
फरवरी में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय की अध्यक्षता में हुई हाई पावर कमेटी की बैठक बिना किसी ठोस निष्कर्ष के समाप्त हो गई थी। उस समय LAB और KDA ने साफ कहा था कि केवल आश्वासन अब पर्याप्त नहीं हैं और लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा देने पर स्पष्ट राजनीतिक निर्णय लिया जाना चाहिए। यही कारण है कि इस बार की बैठक को बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। लद्दाख के भीतर यह भावना लगातार मजबूत हो रही है कि यदि समय रहते राजनीतिक समाधान नहीं निकला, तो क्षेत्रीय असंतोष और अधिक व्यापक रूप ले सकता है।
छठी अनुसूची की मांग इस आंदोलन का सबसे केंद्रीय मुद्दा बन चुकी है। लद्दाख के सामाजिक संगठनों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान, जनजातीय संरचना, पर्यावरणीय संतुलन और जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा अनिवार्य है। उनका तर्क है कि तेज होती बाहरी निवेश गतिविधियां, पर्यटन विस्तार और रणनीतिक परियोजनाएं स्थानीय समुदायों को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल सकती हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों की तरह लद्दाख को भी विशेष संवैधानिक संरक्षण मिले, ताकि भूमि, रोजगार और सांस्कृतिक संरचना पर स्थानीय लोगों का नियंत्रण बना रहे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन अब केवल क्षेत्रीय विकास या प्रशासनिक सुविधा का मुद्दा नहीं रह गया है। लद्दाख भारत की सामरिक सुरक्षा, चीन सीमा, सियाचिन, काराकोरम और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे बड़े राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। ऐसे में यहां बढ़ता सामाजिक असंतोष केंद्र सरकार के लिए केवल राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि रणनीतिक चिंता का विषय भी बन सकता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार भी इस मुद्दे को पूरी तरह नजरअंदाज करने की स्थिति में दिखाई नहीं देती।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लेह और कारगिल जैसे ऐतिहासिक रूप से अलग राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्रों ने इस आंदोलन में अभूतपूर्व एकता दिखाई है। बौद्ध बहुल लेह और शिया मुस्लिम बहुल कारगिल का साझा मंच पर आना इस आंदोलन को और अधिक राजनीतिक वजन देता है। LAB और KDA का संयुक्त दबाव अब दिल्ली के लिए एक गंभीर राजनीतिक संदेश माना जा रहा है कि लद्दाख की मांगें केवल किसी एक समुदाय या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं।
फिलहाल सबकी नजर 22 मई की बैठक पर टिकी हुई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या केंद्र सरकार इस बार कोई ठोस रोडमैप या संवैधानिक आश्वासन देती है, या फिर बातचीत एक बार फिर औपचारिकता बनकर रह जाती है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि लद्दाख का सवाल अब केवल सीमाई भूगोल का मुद्दा नहीं रहा। यह पहचान, संवैधानिक अधिकार, पर्यावरणीय सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ऐसी लड़ाई बन चुका है, जिसने हिमालयी क्षेत्र की राजनीति को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।




