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रूस-ईरान पर ट्रंप की डबल स्ट्राइक : तेल छूट खत्म, दुनिया में महंगे ईंधन का खतरा

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संकट | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 मई 2026

ईरान युद्ध के बीच ऊर्जा युद्ध तेज : रूस पर ट्रंप की नई आर्थिक चोट

ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट के बीच अमेरिका ने ऐसा फैसला लिया है जिसने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताएं और बढ़ा दी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूस से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट यानी “रशियन ऑयल सेल्स वेवर” को समाप्त होने दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले से ही कच्चे तेल की आपूर्ति संकट, बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात से जूझ रही है।

दरअसल, अमेरिका ने कुछ समय पहले भारत समेत कई देशों को रूसी तेल खरीदने के लिए सीमित अवधि की राहत दी थी, ताकि ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण पैदा हुई ऊर्जा कमी को नियंत्रित किया जा सके। यह छूट 16 मई 2026 तक लागू थी। लेकिन अब ट्रंप प्रशासन ने इसे आगे नहीं बढ़ाने का संकेत दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वैश्विक तेल बाजार पर सीधा असर डाल सकता है। ईरान और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण पहले ही तेल आपूर्ति बाधित हो चुकी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है, लगातार तनाव के केंद्र में बना हुआ है। ऐसे में रूसी तेल पर प्रतिबंधों का सख्त होना कई देशों के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

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भारत भी इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ने अमेरिका से अनुरोध किया था कि रूसी तेल खरीद की छूट को आगे बढ़ाया जाए, क्योंकि मौजूदा वैश्विक हालात में ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। भारत लंबे समय से रियायती रूसी तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित करता रहा है।

हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में संकेत दिए थे कि अमेरिका “जो जरूरी होगा वो करेगा” ताकि तेल कीमतों को नियंत्रण में रखा जा सके। उन्होंने यह भी कहा था कि ईरान युद्ध खत्म होते ही तेल की कीमतें नीचे आ सकती हैं। लेकिन वेवर खत्म होने के फैसले ने बाजार में यह संदेश दिया है कि वॉशिंगटन अब रूस और ईरान दोनों पर दबाव बढ़ाने की रणनीति अपना रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती दो मोर्चों पर संतुलन बनाने की है। एक तरफ अमेरिका रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ वह वैश्विक तेल कीमतों को बेकाबू होने से भी रोकना चाहता है। यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी नीति बार-बार बदलती दिखाई दी। पहले छूट देने का फैसला हुआ, फिर उसे रोकने की बात कही गई और बाद में सीमित विस्तार भी किया गया।

इस बीच तेल बाजार में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी हैं। कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज संकट लंबा खिंचता है और रूसी तेल आपूर्ति भी बाधित होती है, तो दुनिया को गंभीर ऊर्जा झटका लग सकता है।

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अमेरिका और चीन के बीच हाल की वार्ताओं में भी ईरान और तेल आपूर्ति बड़ा मुद्दा बना रहा। ट्रंप ने दावा किया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी माना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहना चाहिए और ईरान को परमाणु हथियार नहीं मिलने चाहिए। हालांकि चीन ने सार्वजनिक रूप से इस पर ज्यादा टिप्पणी नहीं की।

स्पष्ट है कि रूस, ईरान और पश्चिम एशिया को लेकर अमेरिकी नीति अब केवल प्रतिबंधों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका रूसी तेल पर अपने रुख को और सख्त करता है या बढ़ती कीमतों और वैश्विक दबाव के चलते फिर किसी नई राहत का रास्ता निकालता है।

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