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क्या मध्य-पूर्व में बन रहा है नया शक्ति गठबंधन? सऊदी-ईरान ‘नॉन-अग्रेशन पैक्ट’ से बदल सकती है दुनिया की राजनीति

ओपिनियन | सूफियान बिन फरहान | ABC NATIONAL NEWS | रियाद/तेहरान/वॉशिंगटन | 15 मई 2026

मध्य-पूर्व की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां दशकों पुराने दुश्मन अब नई रणनीतिक मजबूरियों के तहत बातचीत की मेज पर आने को तैयार दिखाई दे रहे हैं। खबर है कि Saudi Arabia ने क्षेत्रीय देशों और Iran के बीच “नॉन-अग्रेशन पैक्ट” यानी आपसी गैर-आक्रामक समझौते का प्रस्ताव रखा है। यह केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया के बदलते शक्ति संतुलन का संकेत माना जा रहा है। इस प्रस्ताव का मॉडल 1975 के “हेलसिंकी समझौते” जैसा हो सकता है, जिसने शीत युद्ध के दौर में यूरोप में तनाव कम करने का रास्ता बनाया था। अगर ऐसा होता है तो यह पहली बार होगा जब मध्य-पूर्व के देश अमेरिका या पश्चिमी शक्तियों की सुरक्षा छतरी से अलग होकर अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था बनाने की कोशिश करेंगे।

दरअसल ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष ने खाड़ी देशों को यह अहसास करा दिया है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी खतरा खत्म नहीं होगा। सऊदी अरब और खाड़ी देशों को डर है कि युद्ध के बाद ईरान और ज्यादा आक्रामक हो सकता है। दूसरी तरफ उन्हें यह भी महसूस हो रहा है कि अमेरिका अब पहले की तरह स्थायी सुरक्षा गारंटी देने की स्थिति में नहीं दिख रहा। यही वजह है कि अब क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा के लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं।

इस पूरी रणनीति के पीछे सबसे बड़ा संकेत यह है कि मध्य-पूर्व अब “अमेरिका केंद्रित सुरक्षा ढांचे” से धीरे-धीरे बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। लंबे समय तक खाड़ी देशों की सुरक्षा पूरी तरह वॉशिंगटन पर निर्भर रही, लेकिन ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस भरोसे को कमजोर कर दिया। तेल प्रतिष्ठानों, एयरपोर्ट और बंदरगाहों पर हमलों ने यह दिखा दिया कि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के बावजूद खाड़ी देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

यहीं से सऊदी अरब की नई रणनीति सामने आती है। रियाद अब टकराव के बजाय “क्षेत्रीय संतुलन” की राजनीति खेलना चाहता है। यही कारण है कि वह पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देशों के साथ नए रक्षा और आर्थिक सहयोग को भी बढ़ा रहा है। यह केवल सुरक्षा गठबंधन नहीं बल्कि “मध्य-पूर्व की नई धुरी” बन सकती है, जो आने वाले वर्षों में अमेरिका और पश्चिमी प्रभाव को चुनौती दे सकती है।

इस घटनाक्रम में सबसे ज्यादा असहज स्थिति शायद Israel की बनती दिखाई दे रही है। कई अरब और मुस्लिम देशों में यह धारणा मजबूत हुई है कि इजरायल की आक्रामक सैन्य नीति पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना रही है। गाजा, लेबनान और सीरिया में लगातार कार्रवाई के कारण इजरायल को अब केवल सुरक्षा सहयोगी नहीं बल्कि “क्षेत्रीय तनाव का बड़ा कारण” भी माना जाने लगा है। यही वजह है कि प्रस्तावित नॉन-अग्रेशन पैक्ट में इजरायल की भूमिका सबसे बड़ा विवाद बन सकती है।

दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी रणनीतिक जीत ईरान की भी मानी जा सकती है। युद्ध और प्रतिबंधों के बावजूद ईरान आज भी क्षेत्रीय राजनीति का केंद्रीय खिलाड़ी बना हुआ है। सऊदी अरब जैसे देश अब यह स्वीकार कर रहे हैं कि ईरान को पूरी तरह अलग-थलग करके क्षेत्र में स्थिरता संभव नहीं है। यही कारण है कि बातचीत और समझौते की जमीन तैयार की जा रही है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल चीन और अमेरिका को लेकर उठता है। क्या यह सब अमेरिकी प्रभाव में गिरावट का संकेत है? इसका जवाब काफी हद तक “हां” में दिखाई देता है। अमेरिका अब भी सैन्य और आर्थिक महाशक्ति है, लेकिन मध्य-पूर्व में उसका “निर्णायक नियंत्रण” कमजोर होता दिख रहा है। वहीं China लगातार खुद को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में पेश कर रहा है। चीन की कोशिश है कि वह व्यापार, ऊर्जा और कूटनीति के जरिए पूरे क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करे।

यानी दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रह गई है। अमेरिका अकेला निर्णायक केंद्र नहीं रहा। चीन, खाड़ी देश, तुर्किये और क्षेत्रीय शक्तियां अब अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र बना रही हैं। यही वजह है कि आने वाले वर्षों में दुनिया “मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर” यानी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ती दिखाई दे सकती है।

भारत के लिए भी यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और करोड़ों भारतीयों का भविष्य खाड़ी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। यदि क्षेत्र में स्थिरता आती है तो भारत को आर्थिक लाभ होगा, लेकिन यदि नए शक्ति संघर्ष शुरू होते हैं तो तेल कीमतों से लेकर वैश्विक व्यापार तक सब प्रभावित हो सकता है।

सऊदी अरब का यह प्रस्ताव केवल एक शांति पहल नहीं बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत है। यह उस नई दुनिया की तस्वीर है, जहां क्षेत्रीय देश अब बड़ी शक्तियों के मोहरे नहीं बल्कि खुद अपनी शर्तों पर राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था तय करना चाहते हैं।

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