ओपिनियन | यासा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/रियाद | 15 मई 2026
मध्य-पूर्व की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव चुपचाप आकार ले रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक Saudi Arabia और United Arab Emirates ने ईरान के खिलाफ गुप्त सैन्य कार्रवाई की है। यदि यह पूरी तरह सही साबित होता है, तो यह केवल एक सैन्य घटना नहीं बल्कि पश्चिम एशिया की शक्ति संरचना में भूचाल जैसा परिवर्तन माना जाएगा। दशकों तक अमेरिका की सुरक्षा छतरी पर निर्भर रहने वाले खाड़ी देश अब पहली बार अपने दम पर जवाबी कार्रवाई करते दिखाई दे रहे हैं।
यह घटनाक्रम कई बड़े सवाल खड़े करता है। क्या खाड़ी देशों का अमेरिका पर भरोसा कमजोर हुआ है? क्या सऊदी अरब और यूएई अब खुद को क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते हैं? और सबसे अहम सवाल — क्या अमेरिका अब मध्य-पूर्व में पहले जैसा निर्णायक प्रभाव खोता जा रहा है?
दरअसल ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष ने खाड़ी देशों को यह एहसास करा दिया कि केवल अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने खाड़ी देशों के एयरपोर्ट, तेल ठिकानों, बंदरगाहों और कारोबारी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। इससे सऊदी अरब और यूएई की उस छवि को झटका लगा, जिसे वे “सुरक्षित वैश्विक व्यापार और निवेश केंद्र” के रूप में दुनिया के सामने पेश करते रहे हैं।
यही कारण है कि अब खाड़ी देश “रक्षात्मक सहयोगी” की भूमिका से आगे बढ़कर “सक्रिय क्षेत्रीय खिलाड़ी” बनने की कोशिश कर रहे हैं। यदि सऊदी अरब और यूएई ने वास्तव में ईरान पर हमले किए हैं, तो यह संकेत है कि वे अब अमेरिका के पीछे खड़े रहने वाले सहयोगी नहीं बल्कि अपनी शर्तों पर फैसले लेने वाली ताकत बनना चाहते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका और चीन दोनों की भूमिका एक साथ दिखाई दे रही है। एक ओर अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए हुए है, दूसरी ओर चीन खुद को मध्यस्थ और संतुलनकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। हाल ही में बीजिंग में हुई Donald Trump और Xi Jinping की मुलाकात ने भी यह संकेत दिया कि अब मध्य-पूर्व की राजनीति केवल वॉशिंगटन से नियंत्रित नहीं होगी। चीन आर्थिक और कूटनीतिक रूप से तेजी से अपनी जगह बना रहा है।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि अमेरिका पूरी तरह कमजोर हो गया है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उसकी “एकमात्र सुपरपावर” वाली स्थिति को गंभीर चुनौती मिल रही है। पहले खाड़ी देशों की हर बड़ी सुरक्षा रणनीति अमेरिका तय करता था, लेकिन अब वही देश स्वतंत्र सैन्य फैसले लेते दिखाई दे रहे हैं। इसका मतलब है कि अमेरिका का प्रभाव अब साझेदारी के रूप में तो रहेगा, लेकिन नियंत्रण की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है।
इस पूरे संघर्ष में सबसे बड़ी रणनीतिक जीत फिलहाल चीन की दिखाई देती है। चीन बिना सीधे युद्ध में उतरे खुद को संवाद, व्यापार और संतुलन की शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है। दूसरी ओर अमेरिका को एक साथ ईरान, रूस, चीन और घरेलू राजनीतिक दबावों से जूझना पड़ रहा है। यही वजह है कि दुनिया अब धीरे-धीरे “अमेरिकी नेतृत्व वाली एकध्रुवीय व्यवस्था” से “बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था” की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।
भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। खाड़ी क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है तो तेल कीमतों से लेकर वैश्विक बाजार तक सब प्रभावित होंगे। वहीं चीन की बढ़ती भूमिका भारत के रणनीतिक हितों के लिए नई चुनौती बन सकती है।
कुल मिलाकर, मध्य-पूर्व में चल रही यह नई हलचल केवल ईरान, अमेरिका या खाड़ी देशों की कहानी नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की तस्वीर है जहां पुराने शक्ति केंद्र कमजोर पड़ रहे हैं और नए शक्ति केंद्र तेजी से उभर रहे हैं। और शायद यही 21वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक कहानी बनने जा रही है।




