अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 5 मई 2026
संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों पर आधारित लेकिन बदलती प्राथमिकताएं
नेपाल की विदेश नीति लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों और उद्देश्यों पर आधारित रही है, जिसमें शांति, सहयोग और संप्रभुता का सम्मान प्रमुख तत्व हैं। पारंपरिक मित्र देशों, दाता भागीदारों और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना भी इसकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में नेपाल की विदेश नीति का फोकस स्पष्ट रूप से अपने दो बड़े पड़ोसियों—भारत और चीन—के साथ संबंधों को पुनर्गठित और मजबूत करने पर केंद्रित होता दिखाई दे रहा है। इन दोनों देशों की बढ़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति ने नेपाल को अपने कूटनीतिक दृष्टिकोण में बदलाव के लिए मजबूर किया है।
बहुपक्षीय कूटनीति में कमजोरी और सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की बहुपक्षीय कूटनीति अभी भी अपेक्षित स्तर तक विकसित नहीं हो पाई है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर प्रभावी भूमिका निभाने के लिए प्रशिक्षित और अनुभवी कूटनीतिज्ञों की कमी एक बड़ी चुनौती है। दशकों से नेपाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य नहीं बन पाया है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उसकी भागीदारी सीमित रही है। इसके पीछे केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि विदेश मंत्रालय और विदेश मिशनों के बीच समन्वय की कमजोरी भी एक बड़ा कारण मानी जा रही है।
भारत-नेपाल संबंध: निकटता के बावजूद जटिलताएं
भारत और नेपाल के संबंध सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक आधार पर बेहद मजबूत माने जाते हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा और गहरे सामाजिक रिश्ते इसे एक विशेष संबंध बनाते हैं। लेकिन यही निकटता कई बार संवेदनशील मुद्दों को जन्म देती है। सीमा विवाद, सुरक्षा चिंताएं और रणनीतिक हितों का टकराव समय-समय पर दोनों देशों के रिश्तों में तनाव पैदा करता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मुद्दों को भावनात्मक रूप देने के बजाय संवाद और कूटनीतिक माध्यमों से हल करना जरूरी है, ताकि द्विपक्षीय संबंधों की स्थिरता बनी रहे।
चीन के साथ बढ़ता सहयोग और नई चुनौतियां
नेपाल और चीन के बीच संबंध पंचशील के सिद्धांतों पर आधारित रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में चीन की आर्थिक और रणनीतिक ताकत में वृद्धि के साथ नेपाल में उसकी मौजूदगी भी बढ़ी है। बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और निवेश के क्षेत्र में चीन की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। हालांकि अब तक चीन ने नेपाल की आंतरिक राजनीति से दूरी बनाए रखी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह संबंध केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक आयाम भी ले सकता है।
भारत-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन की चुनौती
नेपाल की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखना है। भारत नेपाल को अपने रणनीतिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि चीन दक्षिण एशिया में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। ऐसे में नेपाल को अत्यंत सावधानी से अपने कदम उठाने पड़ते हैं। पश्चिमी देशों की भी इस क्षेत्र में बढ़ती दिलचस्पी इस समीकरण को और जटिल बनाती है।
प्रतिक्रियात्मक नहीं, सक्रिय कूटनीति की जरूरत
नेपाल की विदेश नीति को लेकर सबसे बड़ी आलोचना यह रही है कि वह अक्सर प्रतिक्रियात्मक रही है, यानी घटनाओं के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि नेपाल proactive diplomacy अपनाए—यानी संभावित संकटों का पहले से आकलन कर रणनीति तैयार करे। इसके लिए बेहतर विश्लेषण, दीर्घकालिक योजना और कुशल कूटनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता है।
राजदूत नियुक्ति पर नई बहस
हाल ही में सरकार द्वारा कुछ राजदूतों की नियुक्ति खुले प्रतियोगी प्रक्रिया से करने के प्रस्ताव ने भी बहस छेड़ दी है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि राजदूत का पद सामान्य प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि राज्य की प्रतिष्ठा और संप्रभुता का प्रतीक होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आमतौर पर वरिष्ठ और अनुभवी विदेश सेवा अधिकारियों को ही यह जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में इस प्रक्रिया को सामान्य भर्ती की तरह अपनाना कूटनीतिक परंपराओं के अनुरूप नहीं माना जा रहा।
‘बफर स्टेट’ की अवधारणा पर पुनर्विचार
नेपाल को लंबे समय तक भारत और चीन के बीच “बफर स्टेट” के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब इस अवधारणा पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित अवधारणा है और व्यावहारिक राजनीति में इसका सीमित महत्व है। भारत नेपाल को अपने रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखता है और “विशेष संबंध” की बात करता है, जबकि नेपाल इस पर औपचारिक सहमति नहीं देता।
सतत और स्पष्ट नीति की जरूरत
नेपाल की विदेश नीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व निरंतरता और स्पष्टता माने जा रहे हैं। बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय हालात में नेपाल को अपनी रणनीति को स्पष्ट, संतुलित और व्यावहारिक बनाना होगा। साथ ही, देश को अपने भू-राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी कमजोरियों को समझते हुए दीर्घकालिक नीति तैयार करनी होगी।
नई दिशा की तलाश में नेपाल
नेपाल इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे अपनी विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। एक ओर वैश्विक मंचों पर प्रभाव बढ़ाने की चुनौती है, तो दूसरी ओर भारत और चीन जैसे शक्तिशाली पड़ोसियों के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी। ऐसे में सक्रिय, संतुलित और दूरदर्शी कूटनीति ही नेपाल को स्थिरता और मजबूती की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।




