स्पोर्ट्स | एजेंसी / ABC NATIONAL NEWS | दोहा/लंदन | 27 अप्रैल 2026
पिछले कुछ सालों में दुनिया के खेल जगत में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जहां पहले यूरोप और अमेरिका खेलों के सबसे बड़े केंद्र माने जाते थे, वहीं अब खाड़ी देशों—जैसे कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात—ने इस तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। इन देशों ने अरबों रुपये खर्च करके बड़े-बड़े टूर्नामेंट आयोजित किए, दुनिया के मशहूर खिलाड़ियों को अपने यहां खेलने के लिए बुलाया और कई बड़े क्लबों में भी निवेश किया। नतीजा यह हुआ कि खेल सिर्फ खेल नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा कारोबार बन गया, जिसमें पैसा, शोहरत और राजनीति—सब एक साथ नजर आने लगे। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। दुनिया में बढ़ते तनाव, खासकर अलग-अलग देशों के बीच खिंचाव और संघर्ष, इस खेल निवेश पर असर डाल सकते हैं। पहले जहां खाड़ी देशों का पैसा तेजी से खेलों में आ रहा था, अब उस रफ्तार पर सवाल उठने लगे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर वैश्विक माहौल और ज्यादा अस्थिर हुआ, तो इसका सीधा असर खेलों पर पड़ेगा। बड़े टूर्नामेंट्स की योजना, खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त और स्पॉन्सरशिप डील्स—सब कुछ प्रभावित हो सकता है।
फिर भी यह कहना गलत होगा कि यह दौर पूरी तरह खत्म होने वाला है। उदाहरण के तौर पर फीफा विश्व कप 2022 ने दिखा दिया कि खाड़ी देश अब खेलों में सिर्फ निवेशक नहीं, बल्कि बड़े आयोजक भी बन चुके हैं। उन्होंने दुनिया को यह संदेश दिया कि वे खेलों को नए स्तर तक ले जा सकते हैं। यही वजह है कि भले ही रफ्तार थोड़ी धीमी पड़े, लेकिन यह सिलसिला पूरी तरह रुकने वाला नहीं है।
असल सवाल यह है कि आगे खेल किस दिशा में जाएंगे। क्या खेल सिर्फ पैसा और ताकत दिखाने का जरिया बनेंगे या फिर अपने मूल रूप—प्रतिस्पर्धा और जुनून—की ओर लौटेंगे? खाड़ी देशों का निवेश खेलों को नई ऊंचाई तक जरूर लेकर गया है, लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात यह तय करेंगे कि यह सफर किस मोड़ पर जाकर ठहरता है या फिर एक नई दिशा पकड़ता है।




