राजनीति | ABC NATIONAL NEWS |नई दिल्ली | 17 अप्रैल 2026
नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण को लेकर घंटों चली तीखी बहस और विपक्षी दलों के सवालों के बीच केंद्र सरकार ने गुरुवार देर रात एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरे राजनीतिक गलियारे को हिला दिया। कानून मंत्रालय ने आधी रात के करीब अधिसूचना जारी कर 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 16 अप्रैल 2026 से औपचारिक रूप से लागू कर दिया। यह वही कानून है जिसे सितंबर 2023 के विशेष सत्र में भारी बहुमत से पास किया गया था, लेकिन उसके क्रियान्वयन पर पिछले ढाई साल से सस्पेंस बना हुआ था।
सरकार की इस अचानक अधिसूचना को कई लोग लोकसभा में संख्या की कमी को दूर करने की रणनीति मान रहे हैं। संसद के विशेष सत्र में जब विपक्ष सरकार पर दबाव बना रहा था कि लोकसभा में पर्याप्त समर्थन नहीं है तो उसी दौरान कानून मंत्रालय ने रात के अंधेरे में अधिसूचना जारी कर दी। अधिसूचना में साफ कहा गया है कि संविधान के 106वें संशोधन की धारा 1(2) के तहत केंद्र सरकार 16 अप्रैल 2026 को वह तारीख घोषित करती है जब से इस अधिनियम के प्रावधान प्रभावी होंगे। इस कदम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता कानूनी रूप से खुल गया है, हालांकि असली बदलाव अभी भी परिसीमन के बाद ही दिखेगा।
दरअसल, 2023 का कानून शुरू से ही जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ा गया था, जिसकी वजह से इसका लागू होना 2026 के बाद माना जा रहा था। लेकिन अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया तेज करने और लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर करीब 800 के पार हो सकती हैं, जिसमें करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इस पूरे मामले में सरकार का कहना है कि वह 2029 के आम चुनाव से पहले महिलाओं को उनका हक दिलाना चाहती है, ताकि आधी आबादी को राजनीति के केंद्र में लाया जा सके।
वहीं विपक्ष इस कदम को लेकर खासा नाराज दिख रहा है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे ‘बिल्कुल विचित्र’ करार दिया और कहा कि जब संसद में इस कानून पर संशोधनों की चर्चा चल रही है और कल लोकसभा में मतदान होना है, तो अचानक अधिसूचना जारी करना सरकार की मजबूरी को दिखाता है। कई विपक्षी दल इसे लोकसभा में समर्थन जुटाने में नाकामी का सबूत बता रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार परिसीमन को लेकर भी सही तरीके से चर्चा नहीं कर रही और दक्षिणी राज्यों के साथ उत्तर के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ सकता है।
इस मुद्दे पर अब सियासी घमासान और भी तेज होने वाला है। विशेष सत्र के दौरान कई दलों ने परिसीमन प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई है। कुछ दलों का मानना है कि इससे संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा, जबकि सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम बता रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही कहा था कि यह फैसला देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को और मजबूत करेगा। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में संसद में यह बहस किस दिशा में जाती है और आखिरकार महिलाओं को राजनीति में कितना बड़ा स्थान मिल पाता है।
यह कदम न सिर्फ महिला आरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है, बल्कि भारतीय राजनीति के पूरे समीकरण को बदलने की क्षमता रखता है। चाहे विपक्ष इसे राजनीतिक चाल कहे या सरकार इसे सशक्तिकरण का मंत्र, एक बात साफ है कि 2029 के चुनाव से पहले देश की संसद और विधानसभाओं का चेहरा बदलने वाला है।




