राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 अप्रैल 2026
नई दिल्ली। संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच जोरदार बहस छिड़ी हुई है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर असल में उत्तर भारत के राज्यों को ज्यादा सीटें देकर दक्षिण के राज्यों की आवाज को कमजोर करने की साजिश रच रही है। कांग्रेस सांसद हिबी ईडेन ने लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया और कहा कि फिलहाल उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें हैं जबकि केरल की सिर्फ 20। दोनों के बीच 60 सीटों का अंतर है, लेकिन परिसीमन के बाद यह फर्क बढ़कर 90 हो जाएगा। यूपी की सीटें 120 हो जाएंगी और केरल की 30। इससे उत्तर भारत का संसद में दबदबा और बढ़ जाएगा जबकि परिवार नियोजन में सफल दक्षिण के राज्य नुकसान में रहेंगे।
विपक्ष का कहना है कि 1971 की जनगणना के आधार पर सीटें फ्रीज की गई थीं ताकि छोटे परिवार वाले राज्यों को सजा न मिले। अब नए परिसीमन से उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों को भारी फायदा होगा जहां जनसंख्या वृद्धि ज्यादा है। केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्य जो जनसंख्या नियंत्रण में आगे रहे, उनकी सांसद संख्या अपेक्षाकृत कम बढ़ेगी। कांग्रेस ने मांग की है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करके तुरंत 543 सीटों पर लागू किया जाए, लेकिन सरकार इसे जानबूझकर जोड़ रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में सभी दलों से अपील की कि इस ऐतिहासिक कदम को राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन दें। उन्होंने कहा कि विरोध करने वालों को लंबे समय तक इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी और विपक्ष को श्रेय लेने का मौका देने को भी तैयार हैं। लेकिन विपक्ष मानने को तैयार नहीं। शिवसेना (UBT) के संजय राउत ने बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा कि हिम्मत है तो चुनाव से पहले महिलाओं को दी जाने वाली सब्सिडी बंद कर दो, फिर देखते हैं कितनी महिलाएं साथ रहती हैं।
समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव ने कहा कि इतिहास पहले ही बन चुका है, अब इसे मिटाने की कोशिश हो रही है। एसटी हसन ने महिला आरक्षण को 33 फीसदी से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने और दलित, ओबीसी तथा मुस्लिम महिलाओं को भी इसमें जगह देने की मांग की। वहीं बीजेपी की तरफ से तमिलनाडु के के. अन्नामलाई ने कहा कि लोकसभा सीटों का बढ़ना अच्छी बात है और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देश के लिए सकारात्मक कदम है।
संसद में हंगामे के बीच यह स्पष्ट है कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब उत्तर-दक्षिण राजनीति का केंद्र बन गया है। दक्षिण के मुख्यमंत्री और नेता चिंता जता रहे हैं कि इससे संघीय ढांचा कमजोर होगा। सरकार का दावा है कि कोई राज्य अपनी अनुपातिक ताकत नहीं खोएगा और कुल सीटें बढ़ाई जाएंगी, लेकिन विपक्ष इसे भरोसेमंद नहीं मान रहा। चर्चा के बाद मत विभाजन से तय होगा कि इन बिलों का क्या भविष्य होता है।




