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थकी TMC, संदिग्ध BJP : बंगाल में वोट नहीं, विश्वास दांव पर

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प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अप्रैल 2026

आज पश्चिम बंगाल में सबसे बेचैन करने वाला चुनावी नारा राजनीतिक मंचों से नहीं, बल्कि आम लोगों की बातचीत में धीरे-धीरे सुनाई दे रहा है—क्या यह चुनाव वाकई निष्पक्ष होगा? जब मतदाता पार्टियों से ज्यादा चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने लगें, तो लोकतंत्र खुद असहज स्थिति में पहुंच जाता है। चाय की दुकानों से लेकर जिलों के कस्बों तक, एक ही संदेह हर जगह दिख रहा है—क्या वोट सच में जनता की इच्छा को दर्शाएगा?

यह भरोसे का संकट ऐसे समय आया है जब राजनीतिक मुकाबले में भी कोई साफ दिशा नहीं दिख रही। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल साफ नजर आ रहा है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP), जो सत्ता हासिल करने के लिए जोरदार कोशिश कर रही है, वह भी पूरी तरह विश्वास नहीं जगा पा रही। एक तरफ थकी हुई सत्ताधारी पार्टी है और दूसरी तरफ अनिश्चित मतदाता—ऐसे में बंगाल में कोई लहर नहीं, बल्कि हिचकिचाहट वाला चुनाव हो रहा है, जो चुनाव से ज्यादा संदेह पर आधारित है।

इस बेचैनी के केंद्र में मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) को लेकर विवाद है। आरोप हैं कि SIR के जरिए करीब 91 लाख नाम हटाए गए हैं, जिससे व्यापक चिंता पैदा हो गई है। जो अल्पसंख्यक समुदाय TMC की ओर झुकाव रखते हैं और मतुआ जैसे वर्ग, जिन्हें BJP समर्थक माना जाता है—दोनों ही अपने नाम हटने को लेकर चिंतित हैं। ये हटाए गए नाम प्रक्रिया का हिस्सा हैं या राजनीति से प्रभावित—यह कानूनी जांच का विषय है, लेकिन राजनीति में धारणा ही सबसे बड़ा सच बन जाती है, और यही धारणा नुकसान पहुंचा रही है।

यह अनिश्चितता लोकतंत्र की जड़ों को प्रभावित करती है। एक ऐसे राज्य में जहां चुनाव बेहद प्रतिस्पर्धी और संवेदनशील होते हैं, वहां थोड़ी सी भी हेरफेर की आशंका लोगों का भरोसा तोड़ सकती है। चुनाव आयोग, जिसे निष्पक्ष संस्था माना जाता है, अब लोगों की नजरों में सवालों के घेरे में है। निष्पक्षता, पारदर्शिता और निगरानी को लेकर सवाल अब सिर्फ नेताओं के भाषण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन यह सिर्फ संस्थागत संकट नहीं है। ममता बनर्जी की TMC साफ तौर पर सत्ता विरोधी माहौल से जूझ रही है। कई वर्षों के शासन ने उपलब्धियों के साथ-साथ शिकायतों का भी बोझ बढ़ाया है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के आरोप और लंबे समय से जमी सत्ता से लोगों की थकान—इन सबने असंतोष पैदा किया है, जो सिर्फ TMC ही नहीं बल्कि केंद्र में बैठी BJP के खिलाफ भी दिखता है।

खासकर शहरी इलाकों और युवाओं में यह भावना है कि TMC सरकार बदलती उम्मीदों के मुताबिक खुद को ढाल नहीं पाई।

लेकिन यह असंतोष BJP के पक्ष में साफ तौर पर नहीं गया है।
भले ही BJP ने बड़े स्तर पर अभियान चलाया हो, संगठन को मजबूत किया हो और केंद्र का समर्थन हो—फिर भी वह लोगों के असंतोष को भरोसे में बदलने में सफल नहीं हो पा रही। “परिवर्तन” का उसका नारा लोगों को पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर पा रहा, बल्कि उसमें हिचक दिखाई देती है।

इसकी एक वजह पार्टी की अंदरूनी समस्याएं भी हैं—गुटबाजी, नेतृत्व को लेकर असमंजस और स्थानीय स्तर पर असंगत संदेश। लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा है भरोसे की कमी, जो राष्ट्रीय राजनीति और व्यापक धारणा से जुड़ा है।

पश्चिम एशिया की घटनाओं का असर भी बंगाल के चुनावी माहौल में दिखने लगा है। गाजा और ईरान में मानवीय संकट—जैसे बमबारी, अस्पतालों और स्कूलों पर हमले—इनकी तस्वीरें लोगों की चर्चा में शामिल हैं। खासकर अल्पसंख्यक और सेक्युलर सोच वाले हिंदुओं में भारत की प्रतिक्रिया को लेकर असहजता देखी जा रही है।

भले ही विदेश नीति जटिल होती है, लेकिन चुनावों में भावनाएं ज्यादा असर डालती हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ BJP को सिर्फ शासन के आधार पर नहीं, बल्कि नैतिक रुख के आधार पर भी परखा जा रहा है। यह सवाल लोगों को भावनात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है कि भारत ने नागरिकों की पीड़ा पर खुलकर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी।

इसके साथ ही BJP की “घुसपैठिया” जैसे शब्दों वाली राजनीति और पहचान आधारित मुद्दों को जोर देने से मिला-जुला असर पड़ा है। इससे उसका एक वर्ग तो मजबूत होता है, लेकिन कई मतदाता इससे दूर भी होते हैं, क्योंकि बंगाल की सामाजिक संरचना हमेशा से विविधता और सहअस्तित्व पर आधारित रही है।

पार्टी के व्यापक कथानक में दिखने वाले विरोधाभास भी संदेह को बढ़ाते हैं। कुछ मतदाताओं को लगता है कि सांस्कृतिक संरक्षण की बातें और कुछ राजनीतिक फैसले आपस में मेल नहीं खाते। इससे BJP को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में देखने में हिचक पैदा होती है।

मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर को कथित तौर पर 1000 करोड़ रुपये देकर एक नकली बाबरी मस्जिद बनाने का आरोप और अल्पसंख्यकों में फूट डालने की कोशिश ने BJP की छवि को नुकसान पहुंचाया है। लोगों में अल्पसंख्यकों को लेकर मुद्दे जरूर हैं, लेकिन मंदिरों को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोपों के कारण BJP की छवि पर भी सवाल उठे हैं। “एक मौका BJP को” जैसा नारा भी ज्यादा असर नहीं डाल पाया।

यही बंगाल की असली चुनौती है।

यह चुनाव सिर्फ TMC और BJP के बीच मुकाबला नहीं है, न ही सिर्फ सत्ता विरोध और विपक्ष की ताकत की परीक्षा है। यह इस बात की परीक्षा है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं संदेह से भरे माहौल में अपना भरोसा बनाए रख सकती हैं।

जैसे-जैसे मतदान नजदीक आ रहा है, परिणाम अभी भी खुला हुआ है। बड़ी संख्या में मतदाता BJP को पूरी तरह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखते। वहीं TMC के खिलाफ असंतोष भी वास्तविक है और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इससे एक अजीब स्थिति बनती है—सत्ताधारी कमजोर है, लेकिन चुनौती देने वाला उतना मजबूत नहीं कि उसे हटा सके। यही वजह है कि ममता बनर्जी अभी भी मुकाबले में मजबूती से बनी हुई हैं। आलोचनाओं और थकान के बावजूद TMC का एक मजबूत आधार है, जो उन्हें बंगाल से जुड़ा हुआ मानता है, खासकर उस BJP के मुकाबले जिसे कुछ लोग बाहरी मानते हैं।

कांग्रेस भी इस समीकरण को और जटिल बनाती है, क्योंकि वह कुछ इलाकों में TMC विरोधी वोटों को बांट सकती है।

सबसे बड़ी बात—भरोसे की कमी है।
मतदाता सिर्फ वादों को नहीं तौल रहे, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं—मतदाता सूची, मतदान की निष्पक्षता और चुनाव के बाद की प्रक्रिया तक।

ऐसे माहौल में चुनाव आयोग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे सिर्फ चुनाव कराना ही नहीं, बल्कि अपनी निष्पक्षता और पारदर्शिता को साफ तौर पर दिखाना भी जरूरी है। क्योंकि अगर जनता का भरोसा नहीं होगा, तो निष्पक्ष परिणाम भी सवालों के घेरे में आ सकता है।

बंगाल का चुनाव एक बिखरी हुई तस्वीर पेश करता है—कमजोर सत्ताधारी, अविश्वसनीय चुनौतीकर्ता और असमंजस में पड़ा मतदाता। ऐसे में अंतिम फैसला सिर्फ मतदाता की पसंद पर नहीं, बल्कि उसके भरोसे पर निर्भर करेगा। अगर लोगों को विश्वास हुआ कि प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो वे किसी भी परिणाम को स्वीकार करेंगे—चाहे ममता बनर्जी की वापसी हो या सत्ता परिवर्तन। लेकिन अगर संदेह बना रहा, तो सही जनादेश भी शक के बोझ तले दब जाएगा। इसीलिए बंगाल की असली लड़ाई अब सिर्फ राजनीतिक नहीं रही—
यह भरोसे की लड़ाई है। क्या बैलेट पेपर सच में जनता की इच्छा दिखाएगा— या फिर यह चुनाव भरोसे के संकट में ही उलझ कर रह जाएगा?

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