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मुख्यमंत्री नीतीश ने ली राज्यसभा सांसद पद की शपथ, बड़ा सवाल—DGP से सिपाही कौन बनना चाहता है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/पटना | 10 अप्रैल 2026

बिहार की राजनीति में आज जो हुआ, वह केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता, रणनीति और दबाव की राजनीति का मिला-जुला रूप है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेकर यह साफ कर दिया है कि उनका राजनीतिक सफर अभी थमा नहीं है—लेकिन इसकी दिशा जरूर बदल रही है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल बेहद अहम बनकर उभरता है—क्या कोई भी नेता स्वेच्छा से सत्ता के शिखर (मुख्यमंत्री पद) से हटकर अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष शक्ति वाले पद (राज्यसभा सदस्य) की ओर बढ़ता है? यही वह जगह है जहां “DGP से सिपाही” वाली कहावत सियासी बहस में गूंज रही है।

करीब 20 साल तक बिहार की सत्ता पर काबिज रहना अपने आप में बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन इस लंबे कार्यकाल के दौरान नीतीश कुमार ने कई बार राजनीतिक पाला बदला—कभी बीजेपी के साथ, तो कभी विरोध में RJD के साथ—और हर बार अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे। यही वजह है कि आलोचक उनके इस पूरे सफर को “सत्ता केंद्रित राजनीति” का उदाहरण बताते हैं और यही कारण था उन्हें कुर्सी कुमार भी कहा जाता था।

अब जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा का रास्ता चुना है, तो यह सवाल और भी गहरा हो गया है—क्या यह फैसला वास्तव में उनका अपना था, या उन्हें इसके लिए मजबूर किया गया? बिहार में गठबंधन की राजनीति में जिस तरह Bharatiya Janata Party का प्रभाव बढ़ता गया, उससे यह चर्चा तेज है कि नेतृत्व परिवर्तन का दबाव लगातार बन रहा था।

राजनीतिक गलियारों में यह बात खुलकर कही जा रही है कि परिस्थितियां ऐसी बना दी गईं, जहां Nitish Kumar के पास विकल्प सीमित रह गए। टकराव की स्थिति में सत्ता भी जा सकती थी, इसलिए उन्होंने एक “सम्मानजनक एग्जिट” का रास्ता चुना—राज्यसभा के जरिए।

“DGP से सिपाही” का उदाहरण इसी सच्चाई को दर्शाता है। एक ऐसा नेता, जिसने दो दशकों तक राज्य की कमान संभाली, अचानक खुद को ऐसी भूमिका में ले आता है जहां प्रत्यक्ष प्रशासनिक शक्ति नहीं होती—यह सामान्य राजनीतिक निर्णय नहीं माना जा सकता।

हालांकि, राजनीति केवल पद की नहीं, बल्कि प्रभाव और नेटवर्क की भी होती है। संभव है कि Nitish Kumar पर्दे के पीछे से अपनी पकड़ बनाए रखें और राष्ट्रीय राजनीति में नई भूमिका तलाशें। लेकिन जनता के मन में यह सवाल बना रहेगा—क्या यह रणनीति थी, या मजबूरी? सच यही है कि बिहार की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर है। Nitish Kumar का यह कदम आने वाले समय में न सिर्फ राज्य, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।

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