राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अप्रैल 2026
भाषण से उठी बहस, अब नए मुद्दे पर सीधा वार
केरल में दिए गए भाषण में Narendra Modi ने “केरल फाइल्स” और “कश्मीर फाइल्स” जैसी फिल्मों का जिक्र करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि जब इन फिल्मों में दिखाई गई बातों को सामने लाया जाता है, तो कुछ लोग उसे झूठ बताने लगते हैं। यह बयान राजनीतिक रूप से काफी चर्चा में रहा, लेकिन इसी के जवाब में अब एक नया मोड़ सामने आया है, जब Sanjay Singh ने “एपिस्टिन फाइल” का मुद्दा उठाकर सीधा सवाल खड़ा कर दिया।
संजय सिंह का सवाल—“एक बात सही, दूसरी पर चुप्पी क्यों?”
Sanjay Singh ने अपने बयान में कहा कि अगर फिल्मों के जरिए किसी मुद्दे को सामने लाना सही है, तो फिर “एपिस्टिन फाइल” जैसे मामलों पर सवाल उठाने से परहेज क्यों किया जाता है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में यह जरूरी है कि हर तरह के मुद्दों पर खुलकर बात हो—चाहे वह राजनीतिक हो, सामाजिक हो या अंतरराष्ट्रीय।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ मुद्दों पर जोर-शोर से चर्चा होती है, जबकि कुछ गंभीर सवालों पर चुप्पी साध ली जाती है, और यही बात लोगों के मन में संदेह पैदा करती है।
“चयनात्मक मुद्दों की राजनीति”—विपक्ष का आरोप
Sanjay Singh का आरोप है कि राजनीति में अब “चयनात्मक मुद्दों” को ही आगे बढ़ाया जा रहा है। उनके मुताबिक, जो मुद्दे सत्ता पक्ष के नैरेटिव को मजबूत करते हैं, उन्हें प्रमुखता दी जाती है, जबकि असहज सवालों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
एपिस्टिन फाइल का जिक्र इसी संदर्भ में किया गया है—एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा, जिस पर दुनिया भर में चर्चा हुई, लेकिन भारतीय राजनीति में उस पर खुली बहस कम देखने को मिली।
बहस का दायरा बढ़ा, राजनीति हुई और तीखी
इस बयान के बाद सियासी बहस और तेज हो गई है। अब चर्चा सिर्फ फिल्मों या घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामलों और उनकी राजनीतिक व्याख्या तक पहुंच गई है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं—एक तरफ फिल्मों और घटनाओं के जरिए मुद्दे उठाए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष उन पर सवाल खड़े कर रहा है और नए मुद्दे सामने ला रहा है।
सवालों का दायरा बढ़ा, जवाब अभी बाकी
यह पूरा मामला अब सिर्फ एक बयान का जवाब नहीं रहा, बल्कि यह उस बड़े सवाल का हिस्सा बन गया है कि क्या राजनीति में सभी मुद्दों पर बराबरी से बात हो रही है या नहीं।
Sanjay Singh ने “एपिस्टिन फाइल” का जिक्र करके यह संकेत दिया है कि बहस का दायरा सीमित नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में हर सवाल उठना चाहिए—और उससे भी ज्यादा जरूरी है कि उन सवालों के जवाब भी मिलें।




