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आपदा में अवसर या मुनाफे का खेल? देश की जमीन-पानी-थाली पर एथेनॉल का सौदा!

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ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | नई दिल्ली | 4 अप्रैल 2026

हर संकट अब “मौका” बनता जा रहा है…

भारत में अब एक अजीब ट्रेंड दिखने लगा है—हर संकट को “सुधार” और “मौका” बताकर पेश किया जाता है। Strait of Hormuz में तेल संकट को भी उसी तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग यानी E20 को सही ठहराया जा सके। इसे देशहित, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण बचाने का कदम बताया जा रहा है, लेकिन असल तस्वीर कुछ और ही है। सच यह है कि यह नीति ऊपर से जितनी चमकदार दिखती है, अंदर से उतनी ही कमजोर है। यह खेती, पानी और जमीन—तीनों पर दबाव डाल सकती है, जबकि फायदा कुछ खास उद्योगों को मिलता नजर आ रहा है।

आम आदमी दो तरफ से पिस रहा है

इस नीति का सबसे बड़ा असर सीधे आम आदमी पर पड़ता है। एथेनॉल मिलाने से गाड़ियों का माइलेज 8–10% तक घट जाता है, यानी पेट्रोल भरवाने के बाद गाड़ी कम चलती है। ऊपर से, अगर आपकी गाड़ी पुरानी है तो उसमें बदलाव करवाने के लिए 20 हजार से लेकर 70 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। सोचिए, जब देश में 40 करोड़ से ज्यादा वाहन हैं, तो यह खर्च कितना बड़ा बोझ बन सकता है। यानी एक तरफ ईंधन ज्यादा लगेगा और दूसरी तरफ जेब से अलग पैसा जाएगा—दोहरी मार साफ दिख रही है।

खाना उगाने वाली जमीन अब ईंधन बनाएगी?

E20 का लक्ष्य हासिल करने के लिए हर साल करीब 1016 करोड़ लीटर एथेनॉल की जरूरत होगी। इसके लिए गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों का इस्तेमाल बढ़ेगा—यानी जो फसलें हमारी थाली भरती हैं, वही अब टैंक भरने में लगेंगी। अनुमान है कि इसके लिए लाखों टन अनाज और करोड़ों टन गन्ना चाहिए होगा, और करीब 71 लाख हेक्टेयर जमीन इस काम में लग सकती है। इसका सीधा मतलब है—खाने के लिए जमीन कम और ईंधन के लिए ज्यादा। ऐसे में आने वाले समय में खाने की कमी और महंगाई बढ़ना तय है।

पानी की बर्बादी: एक लीटर ईंधन के लिए हजारों लीटर पानी

एथेनॉल बनाने में पानी की खपत चौंकाने वाली है। सिर्फ गन्ने से एक लीटर एथेनॉल बनाने में करीब 2860 लीटर पानी लगता है। भारत जैसे देश में, जहां पहले ही पानी की कमी है, यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। NITI Aayog का अनुमान है कि अगर एथेनॉल उत्पादन इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले सालों में सिंचाई के लिए पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ेगी—इतनी कि यह कई बड़े शहरों की सालों की जरूरत के बराबर होगी। यानी जो पानी पीने और खेती के लिए चाहिए, वही अब ईंधन बनाने में जाएगा।

क्या सच में यह पर्यावरण के लिए अच्छा है?

एथेनॉल को “ग्रीन फ्यूल” कहकर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन इसकी सच्चाई इतनी सीधी नहीं है। ज्यादा उत्पादन के लिए ज्यादा खेती करनी होगी, जिसके लिए जंगल या दूसरी जमीन साफ करनी पड़ेगी। साथ ही ज्यादा खाद और कीटनाशक इस्तेमाल होंगे, जिससे प्रदूषण और बढ़ सकता है। अमेरिका जैसे देशों में पहले ही देखा जा चुका है कि बायोफ्यूल ने पर्यावरण को फायदा देने के बजाय नुकसान ही बढ़ाया।

महंगाई और खाने की किल्लत का खतरा

भारत पहले से ही महंगाई और फसल की कमी से जूझ रहा है। मौसम की मार से कई बार गेहूं, चावल और गन्ने की पैदावार प्रभावित हुई है। सरकार को कई बार निर्यात रोकना पड़ा ताकि देश में कमी न हो। ऐसे में अगर यही फसलें ईंधन बनाने में लगेंगी, तो बाजार में खाने की चीजें कम होंगी और दाम बढ़ेंगे। इसका सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग की थाली पर पड़ेगा।

तीन बड़ी सुरक्षा पर खतरा: जमीन, पानी और खाना

अगर सीधी भाषा में समझें, तो यह नीति तीन सबसे जरूरी चीजों को खतरे में डाल रही है—खेती की जमीन, भूजल और खाने की उपलब्धता। ये तीनों ही किसी भी देश की बुनियादी सुरक्षा मानी जाती हैं। अगर इन पर दबाव बढ़ा, तो भविष्य में संकट और गहरा हो सकता है।

फायदा किसे और नुकसान किसे?

जहां आम लोग महंगाई और पानी की कमी झेल रहे हैं, वहीं एथेनॉल उद्योग अच्छा मुनाफा कमा रहा है—करीब 20 से 25 रुपये प्रति लीटर तक। हाल ही में तेल कंपनियों ने जितनी एथेनॉल की जरूरत बताई, उससे कहीं ज्यादा कंपनियों ने ऑफर कर दिया। इससे साफ है कि इस सेक्टर में जरूरत से ज्यादा निवेश हो चुका है—करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक। यानी उद्योग के लिए यह “सोने की खान” बन गया है।

नीतियों का सहारा, मुनाफे का खेल

सरकार की नीतियां—जैसे तय कीमतें, सब्सिडी और अनिवार्य खरीद—इस उद्योग को लगातार बढ़ावा दे रही हैं। 2022 में जब चीनी के निर्यात पर रोक लगी, तो कंपनियों ने तुरंत एथेनॉल की तरफ रुख कर लिया। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में नई डिस्टिलरी तेजी से खुल रही हैं। साफ है कि नीति का झुकाव उद्योग के पक्ष में ज्यादा दिखता है, जबकि इसका बोझ आम जनता पर पड़ता है।

क्या यह सही ऊर्जा समाधान है?

एथेनॉल को मुख्य समाधान बनाना सही नहीं लगता, क्योंकि यह न तो पूरी तरह साफ है और न ही इससे तेल पर निर्भरता बहुत कम होती है। इसकी ऊर्जा भी पेट्रोल से कम होती है। ऐसे में इसे “रामबाण” बताना सही नहीं है। भारत को अपनी जरूरतों और हालात के हिसाब से संतुलित ऊर्जा नीति बनानी चाहिए।

असली समाधान क्या हो सकता है?

भारत के पास बेहतर विकल्प हैं—जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना भी जरूरी है। अगर बायोफ्यूल बनाना ही है, तो कचरे और नई तकनीक का इस्तेमाल होना चाहिए, न कि खाने वाली फसलों का।

दिखावे से ज्यादा ज़रूरी है संतुलन

देश को ऊर्जा भी चाहिए और खाना-पानी भी। अगर एक के लिए दूसरे को खतरे में डाल दिया गया, तो यह समझदारी नहीं होगी। साफ ईंधन जरूरी है, लेकिन ऐसी कीमत पर नहीं कि खेत सूख जाएं और लोगों की थाली खाली हो जाए। असली समझदारी इसी में है कि विकास और संसाधनों के बीच सही संतुलन बनाया जाए।

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