राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अप्रैल 2026
आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव 2024 अब सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर लगे गंभीर आरोपों का केंद्र बन चुका है। जो तथ्य और आंकड़े सामने आए हैं, वे सीधे-सीधे इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मतदान प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं हुईं। 6 सेकंड में वोट डाले जाने के दावे, रात 11:45 बजे के बाद भी वोटिंग जारी रहना और आधी रात से लेकर सुबह 2 बजे तक कुल 4% वोट दर्ज होना—ये सभी बातें सामान्य चुनावी प्रक्रिया के बिल्कुल विपरीत हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि मतदान समाप्त होने के बाद भी करीब 17 लाख वोट दर्ज किए गए। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह सिर्फ तकनीकी खामी है या फिर चुनावी प्रणाली के साथ गंभीर छेड़छाड़ हुई है।
दिल्ली में आयोजित एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस में, जिसमें देश के लगभग सभी प्रमुख मीडिया संस्थान मौजूद थे, चुनाव से जुड़े ऐसे आंकड़े और तथ्य सामने रखे गए, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि जो डेटा सामने आया है, वह सामान्य चुनावी व्यवहार से बिल्कुल अलग और बेहद असामान्य है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्थशास्त्री परकाला प्रभाकर ने स्पष्ट तौर पर कहा कि चुनाव के दौरान कई स्थानों पर “असामान्य वोटिंग पैटर्न” दर्ज किए गए, जो किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंता का विषय है। उनके अनुसार, कुल वोटों का लगभग 4.16 प्रतिशत हिस्सा रात 11:45 बजे से लेकर सुबह 2 बजे के बीच डाला गया, जबकि आधिकारिक तौर पर मतदान की समय सीमा इससे पहले ही समाप्त हो चुकी थी।
आंकड़ों का विश्लेषण और भी ज्यादा गंभीर तस्वीर पेश करता है। करीब 17 लाख वोट आधी रात के बाद दर्ज होना अपने आप में एक बड़ा सवाल है, वहीं शाम 8 बजे से लेकर रात 2 बजे के बीच कुल 52 लाख वोट रिकॉर्ड होना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार करता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि कुछ स्थानों पर वोटिंग की गति इतनी तेज पाई गई कि हर 20 सेकंड में एक वोट और कुछ मामलों में मात्र 6 सेकंड में वोट दर्ज होने का दावा किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि एक ईवीएम मशीन को एक वोट दर्ज करने के बाद रीसेट होने में ही लगभग 14 सेकंड का समय लगता है, ऐसे में 6 सेकंड में वोटिंग संभव होना तकनीकी रूप से असंभव के करीब है। यह स्थिति केवल संदेह नहीं, बल्कि गंभीर जांच की मांग करती है।
मतदान प्रतिशत के आंकड़ों में भी जो बदलाव देखने को मिला, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। चुनाव के दिन शाम 5 बजे तक मतदान लगभग 68 प्रतिशत बताया गया था, लेकिन देर रात होते-होते यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 76 प्रतिशत से अधिक हो गया और अंततः 81.79 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह अचानक हुई वृद्धि कई सवाल खड़े करती है, खासकर तब जब मतदान की आधिकारिक समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का उछाल बिना किसी असामान्य कारण के संभव नहीं है।
इसी चुनाव में एनडीए गठबंधन ने भारी जीत दर्ज करते हुए 175 में से 164 सीटें हासिल कीं। हालांकि अब इन खुलासों के बाद यह जीत भी सवालों के घेरे में आ गई है। कई राजनीतिक दलों और स्वतंत्र विश्लेषकों का कहना है कि जब तक इन आंकड़ों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक चुनाव परिणामों को पूरी तरह से स्वीकार करना मुश्किल होगा। यह मामला अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र की जड़ों को प्रभावित करने वाला गंभीर मुद्दा बन गया है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। आरोप लगाए गए कि बूथ-वार डेटा, विशेष रूप से फॉर्म 17C, को सार्वजनिक नहीं किया गया, जिससे स्वतंत्र रूप से आंकड़ों की जांच करना संभव नहीं हो पाया। इसके अलावा, मतदान से जुड़े डेटा को मशीन-रीडेबल फॉर्म में उपलब्ध न कराना और मतदान समाप्ति के बाद कतार में मौजूद मतदाताओं का स्पष्ट रिकॉर्ड न होना भी पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करता है। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जब डेटा छुपाया जाता है, तो संदेह और गहरा हो जाता है।
पूरा मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन चुका है। अगर इन आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह केवल आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की चुनावी प्रणाली के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है, और जब उसी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, तो जवाबदेही तय करना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो जाता है। अब देश की नजर इस बात पर टिकी है कि इन गंभीर आरोपों की जांच कैसे और कब होती है, और क्या सच्चाई सामने आ पाएगी।




