अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | न्यूयॉर्क | 1 अप्रैल 2026
‘रेजीम चेंज’ युद्धों को बताया खतरनाक, अमेरिका-इजरायल नीति पर गंभीर सवाल
न्यूयॉर्क सिटी के मेयर Zohran Mamdani ने अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई पर तीखा और बेबाक रुख अपनाते हुए इस पूरे युद्ध को “हर स्तर पर विरोध योग्य” करार दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि एक ऐसी नीति का हिस्सा है, जिसके परिणाम पहले भी दुनिया देख चुकी है—और वे हमेशा विनाशकारी ही रहे हैं। ममदानी ने विशेष रूप से “रेजीम चेंज वॉर” यानी किसी देश की सरकार को बलपूर्वक बदलने की रणनीति पर निशाना साधा। उनका कहना था कि अमेरिका ने अतीत में कई बार इस रास्ते को अपनाया है, लेकिन हर बार इसके नतीजे अस्थिरता, हिंसा और मानवीय त्रासदी के रूप में सामने आए हैं। उन्होंने इशारों में यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के खिलाफ मौजूदा कार्रवाई उसी खतरनाक सोच का विस्तार लगती है, जहां सैन्य ताकत के जरिए राजनीतिक परिणाम हासिल करने की कोशिश की जा रही है।
ममदानी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई लगातार तेज हो रही है और मध्य-पूर्व में हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि इस तरह की रणनीति न केवल तत्काल संकट को गहरा करती है, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए भी अस्थिरता की नींव रख देती है। उनके मुताबिक, यह रास्ता समाधान नहीं, बल्कि और बड़े टकराव की ओर ले जाता है।
इस बयान ने अमेरिका के भीतर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। जहां एक ओर सरकार की आधिकारिक नीति इजरायल के समर्थन में खड़ी नजर आती है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग का एक हिस्सा खुलकर इस युद्ध पर सवाल उठा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि Zohran Mamdani की यह टिप्पणी उसी बढ़ती असहमति की आवाज है, जो अब धीरे-धीरे मुखर होती जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस युद्ध को लेकर मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं। कई देश जहां इसे जरूरी कार्रवाई बता रहे हैं, वहीं बड़ी संख्या में देश और संगठन इसे क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा मान रहे हैं। ऐसे में ममदानी का बयान केवल एक स्थानीय नेता की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस वैश्विक चिंता की प्रतिध्वनि भी है, जो इस समय दुनिया भर में महसूस की जा रही है।
न्यूयॉर्क मेयर का यह बयान केवल शब्दों का विरोध नहीं, बल्कि नीति पर सवाल उठाने की कोशिश है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह विरोध महज राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर यह अमेरिका की विदेश नीति पर भी किसी ठोस बदलाव का दबाव बना पाता है।




