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मोहभंग अभी बाकी है — आस्था, प्रचार और सियासत के बीच उलझा एक सच

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ओपिनियन | प्रभात डबराल, वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अप्रैल 2026

दो-तीन साल पुरानी एक घटना है, लेकिन उसके मायने आज और ज्यादा साफ दिखाई देते हैं। अचानक एक दिन Madhu Kishwar का फोन आया। हमारी कोई खास नजदीकी नहीं थी—बस दो-एक बार मुलाकात, एक बार देहरादून से दिल्ली तक शताब्दी ट्रेन में साथ सफर, और औपचारिक पहचान भर। इसलिए जब उन्होंने खुद फोन करके बातचीत शुरू की, तो स्वाभाविक तौर पर आश्चर्य भी हुआ और जिज्ञासा भी।

जिज्ञासा इसलिए भी थी क्योंकि मधु किश्वर का सफर अपने आप में एक कहानी है—मानुषी जैसी गंभीर पत्रिका की संपादक से लेकर एक दौर में खुलकर मोदी समर्थक और आक्रामक हिंदुत्व की मुखर आवाज बनने तक। विचारों का यह बदलाव किसी भी संवेदनशील पर्यवेक्षक के लिए दिलचस्प ही नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण भी है। ऐसे में उनका अचानक फोन आना और सीधे मुद्दे पर आ जाना—“सुना है पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ आपके साथ काम करता था, कैसा आदमी है?”—इस बातचीत को साधारण नहीं रहने देता।

Pushpendra Kulshreshtha का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सोशल मीडिया पर आक्रामक हिंदुत्व की भाषा और शैली के साथ उन्होंने एक खास वर्ग में लोकप्रियता हासिल की। लेकिन मेरा अनुभव उनसे बिल्कुल अलग रहा। वह कुछ वर्षों तक मेरे साथ एक चैनल में प्रोडक्शन से जुड़े काम में रहे। उस दौरान के अनुभव—खट्टे भी थे और मीठे भी—लेकिन जो तस्वीर बनी, वह उस चमकदार छवि से काफी अलग थी, जो बाद में सार्वजनिक मंचों पर दिखी।

करीब आधे घंटे तक मधु किश्वर और मेरी बातचीत इसी विषय पर घूमती रही। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे पुष्पेंद्र उनके संपर्क में आए, कैसे कुछ संगठनों से जुड़े लोगों के साथ मिलकर कथित तौर पर आर्थिक गड़बड़ियों और धोखाधड़ी के आरोपों में उनका नाम जुड़ा, और कैसे इस पूरी प्रक्रिया ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। बातचीत के दौरान एक बात उन्होंने बार-बार दोहराई—“इन लोगों का हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, ये सिर्फ फायदा उठाने आए हैं।”

यहीं से इस पूरे प्रसंग का असली अर्थ खुलता है। यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति या एक विवाद की कहानी नहीं है, बल्कि उस बड़े ट्रेंड की झलक है, जिसमें धर्म, आस्था और पहचान को राजनीतिक और आर्थिक लाभ के औजार में बदला जा रहा है। मधु किश्वर जैसी विचारक, जिन्होंने एक दौर में इस धारा का समर्थन किया, जब उसी धारा के भीतर से निराशा और असहमति की आवाज उठाती हैं, तो यह महज व्यक्तिगत मोहभंग नहीं रहता—यह एक व्यापक संकेत बन जाता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय तक मधु किश्वर का Narendra Modi से मोहभंग पूरी तरह नहीं हुआ था। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। यह बदलाव अचानक नहीं आता—यह अनुभवों, टकरावों और धीरे-धीरे खुलती परतों का नतीजा होता है। और यही वजह है कि यह सवाल और बड़ा हो जाता है—क्या यह मोहभंग सिर्फ कुछ लोगों तक सीमित है, या यह एक लंबी प्रक्रिया की शुरुआत है?

असल मुद्दा यही है कि अभी भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो न सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व का अंध समर्थन करता है, बल्कि उन आक्रामक प्रचारकों का भी प्रशंसक है, जो धर्म और पहचान के नाम पर भावनाओं को भड़काकर अपना प्रभाव बढ़ाते हैं। उनके लिए यह सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि एक तरह की पहचान बन चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह वर्ग भी कभी उसी तरह के अनुभवों से गुजरेगा, जिनसे मधु किश्वर गुजरीं? या फिर प्रचार का प्रभाव इतना मजबूत है कि सच्चाई सामने आने के बाद भी उसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा?

यहां “मोहभंग” सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है—धीमी, असहज और कई बार दर्दनाक। यह तब शुरू होती है जब व्यक्ति अपने विश्वास और वास्तविकता के बीच का अंतर महसूस करता है। लेकिन हर कोई इस प्रक्रिया से नहीं गुजरता। कई लोग अपनी धारणाओं में ही सुरक्षित महसूस करते हैं, चाहे उनके आसपास की सच्चाई कुछ भी क्यों न कह रही हो।

प्रभात डबराल की यह टिप्पणी सिर्फ एक अनुभव का बयान नहीं है, बल्कि एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिघटना की ओर इशारा करती है। आस्था और राजनीति का यह मेल कब विश्वास से भ्रम में बदल जाता है, यह समझना आसान नहीं होता।

लेकिन इतना तय है—मोहभंग का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। कई लोग अभी भी उस मोड़ तक नहीं पहुंचे हैं, जहां सवाल उठते हैं। और शायद यही इस पूरे दौर की सबसे बड़ी कहानी है—सवालों का इंतजार।

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