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मोदी सरकार के 12 साल: प्रजातंत्र नहीं, प्राचारतंत्र — रोजगार, असमानता और सामाजिक संतुलन पर सवाल बरकरार

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ओपिनियन | Sushant Singh, वरिष्ठ पत्रकार | नई दिल्ली | 1 अप्रैल 2026

पिछले 12 वर्षों में Narendra Modi के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अपने शासन को “ऐतिहासिक परिवर्तन” के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बड़े-बड़े मंचों, अंतरराष्ट्रीय आयोजनों और देशभर में फैले विज्ञापन अभियानों के जरिए एक ऐसी तस्वीर गढ़ी गई, जिसमें भारत तेज़ी से आगे बढ़ता, आत्मनिर्भर और वैश्विक शक्ति के रूप में उभरता दिखता है। लेकिन जब इस चमकदार तस्वीर के पीछे झांकते हैं, तो एक असहज सच्चाई सामने आती है—क्या यह बदलाव उतना गहरा और व्यापक है, जितना दिखाया गया, या फिर यह उपलब्धियों से कहीं ज्यादा उनके आक्रामक प्रचार का नतीजा है? यही वह बिंदु है जहां “प्रजातंत्र” और “प्राचारतंत्र” के बीच की रेखा धुंधली पड़ती नजर आती है, और यही इस पूरे दौर की सबसे बड़ी बहस बन चुकी है।

आर्थिक मोर्चे पर सरकार के पास गिनाने के लिए ठोस उपलब्धियां हैं—इसमें कोई दो राय नहीं। 2014 की तुलना में अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना होकर 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है, इंफ्रास्ट्रक्चर में अभूतपूर्व निवेश हुआ है, डिजिटल इंडिया और UPI जैसे प्लेटफॉर्म ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक अलग पहचान दिलाई है, और DBT जैसी योजनाओं ने सरकारी लाभ सीधे लोगों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाया है। NITI Aayog के आंकड़ों के अनुसार करोड़ों लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए हैं, जो किसी भी सरकार के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद जब रोजगार की बात आती है, तो तस्वीर अचानक कमजोर पड़ जाती है—और यही वह जगह है जहां सरकार के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच का अंतर सबसे ज्यादा साफ दिखता है, और “विकास” का दावा सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में आता है।

रोजगार सृजन इस पूरे दौर की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, और यही वह मुद्दा है जिस पर सरकार सबसे ज्यादा असहज नजर आती है। हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा राजनीतिक मंचों से बार-बार दोहराया गया, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि बड़ी संख्या में युवा आज भी स्थायी, सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बेरोजगारी दर में गिरावट के आधिकारिक आंकड़े जरूर पेश किए जाते हैं, लेकिन इनके भीतर छिपी वास्तविकता—अंडरएम्प्लॉयमेंट, अस्थायी काम, गिग इकॉनमी और कम आय वाले रोजगार—इस “सुधार” की पूरी कहानी को कमजोर कर देती है। शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी अब भी दो अंकों के आसपास बनी हुई है, और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, जिसे रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत बनना था, आज भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाया है। अगर आर्थिक विकास का मॉडल बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं दे पा रहा, तो यह विकास अधूरा ही नहीं, बल्कि असंतुलित भी कहा जाएगा।

इसके साथ ही आर्थिक असमानता का मुद्दा इस पूरे मॉडल की गहरी खामी को उजागर करता है। आंकड़े बताते हैं कि देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा शीर्ष 1 प्रतिशत के पास सिमटता जा रहा है, जबकि निचले तबकों की हिस्सेदारी बेहद सीमित है। इसका सीधा अर्थ यह है कि विकास हुआ जरूर, लेकिन समान रूप से नहीं बंटा। शहरों की चमक और कॉरपोरेट सेक्टर की तेजी के बीच गांवों, किसानों और निम्न आय वर्ग की वास्तविक स्थिति में उतना बदलाव नहीं आया, जितना प्रचार में दिखाया गया। यही वह बिंदु है जहां “विकास” एक नारा बनकर रह जाता है, और आम आदमी के लिए उसका मतलब सीमित हो जाता है।

विदेश नीति के क्षेत्र में भी सरकार ने अपनी सक्रियता और आक्रामकता से एक प्रभावशाली छवि जरूर बनाई है। वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी बढ़ी है, बड़े-बड़े आयोजन हुए हैं, और व्यक्तिगत कूटनीति ने देश की ब्रांडिंग को नई ऊंचाई दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह छवि वास्तविक रणनीतिक मजबूती में बदली? चीन के साथ जारी तनाव, पड़ोसी देशों में उसका बढ़ता प्रभाव, और क्षेत्रीय संतुलन में भारत की चुनौतियां यह बताती हैं कि कूटनीति केवल दृश्यता और इवेंट मैनेजमेंट का खेल नहीं है। यहां भी “दिखना” और “हासिल करना” दो अलग-अलग बातें हैं—और यही अंतर इस पूरे विमर्श को और तीखा बनाता है।

आंतरिक स्तर पर भी तस्वीर उतनी सरल नहीं है, जितनी प्रस्तुत की जाती है। एक ओर सरकार के समर्थक अनुच्छेद 370 हटाने और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे फैसलों को मजबूत नेतृत्व का प्रतीक बताते हैं, वहीं दूसरी ओर आलोचक इस दौर को सामाजिक ध्रुवीकरण और संस्थाओं पर बढ़ते दबाव के रूप में देखते हैं। मीडिया, न्यायपालिका और अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर उठते सवाल यह दर्शाते हैं कि लोकतंत्र की गुणवत्ता को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि लोकतंत्र समाप्त हो गया है, लेकिन यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसकी निष्पक्षता और संतुलन पर पहले से ज्यादा सवाल उठ रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले 12 वर्षों में “काम” और “प्रचार” के बीच की दूरी कम होने के बजाय कई बार उलटती हुई दिखाई दी है। उपलब्धियां अपनी जगह हैं, लेकिन उनका प्रस्तुतीकरण इतना आक्रामक और व्यापक रहा कि कई बार वास्तविकता उससे पीछे छूटती हुई महसूस होती है। बड़े वादे—हर साल दो करोड़ रोजगार, भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना, “अच्छे दिन”—आज भी अधूरे सवालों की तरह सामने खड़े हैं, और यही इस पूरे दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई बन चुकी है।

बारह साल बाद भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास की कहानी और जमीनी असमानताएं एक साथ चल रही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल क्रांति और वैश्विक पहचान के क्षेत्र में स्पष्ट प्रगति हुई है, लेकिन रोजगार, आर्थिक बराबरी और सामाजिक संतुलन की चुनौतियां उतनी ही गंभीर बनी हुई हैं। अब असली सवाल यह नहीं है कि सरकार ने काम किया या नहीं—सवाल यह है कि क्या जितना दिखाया गया, उतना वास्तव में देश के आम आदमी ने महसूस भी किया? अगर आने वाले वर्षों में इन बुनियादी सवालों का ठोस और ईमानदार जवाब नहीं दिया गया, तो “विकास” का सबसे बड़ा नैरेटिव ही धीरे-धीरे भरोसे की कसौटी पर कमजोर पड़ सकता है।

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