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ICC जज निकोलस गुइयू पर अमेरिकी प्रतिबंध: नेतन्याहू वारंट के बाद ‘डिजिटल जीवन’ पर असर

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | पेरिस/नई दिल्ली | 30 मार्च 2026

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने के फैसले से जुड़े अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के फ्रांसीसी जज निकोलस गुइयू इन दिनों अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण गंभीर मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ा है और वे सामान्य डिजिटल सुविधाओं का उपयोग भी नहीं कर पा रहे हैं।

 

नवंबर 2024 में ICC ने गाजा में कथित युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपों को लेकर नेतन्याहू और इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। इस फैसले में प्री-ट्रायल चैंबर-I के तीन जज शामिल थे, जिनमें निकोलस गुइयू भी प्रमुख भूमिका में थे।

इस फैसले के बाद डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिकी प्रशासन ने अगस्त 2025 में ICC से जुड़े कुछ अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिए, जिनमें गुइयू का नाम भी शामिल बताया जाता है। अमेरिका का आरोप था कि ICC ने “अमेरिका और उसके सहयोगी इजरायल के खिलाफ अवैध कार्रवाई” की है।

प्रतिबंधों के असर को लेकर गुइयू ने फ्रांस के एक इंटरव्यू में कहा कि उनका जीवन अचानक काफी सीमित हो गया है। उनके मुताबिक, वे अब अपना बैंक कार्ड इस्तेमाल नहीं कर पा रहे, ऑनलाइन शॉपिंग नहीं कर सकते और न ही अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर बुकिंग कर पा रहे हैं। उन्होंने इसे “30 साल पीछे धकेल देने” जैसा बताया और कहा कि यह स्थिति उन्हें डिजिटल युग से पहले के दौर में वापस ले गई है।

गुइयू ने यह भी कहा कि न्याय के लिए खड़ा होना आसान नहीं होता, लेकिन अगर जज, वकील और अभियोजक डरने लगें तो न्याय व्यवस्था कमजोर हो जाती है। उनके बयान को कई लोग न्यायिक स्वतंत्रता के मुद्दे से जोड़कर देख रहे हैं।

इस पूरे मामले पर फ्रांस सरकार ने भी चिंता जताई है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने अमेरिकी प्रशासन से इन प्रतिबंधों को हटाने के लिए कई बार अपील की है। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने इस मुद्दे पर कई पत्र भी लिखे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

यह मामला अब केवल एक जज या एक फैसले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्याय, संप्रभुता और वैश्विक राजनीति के टकराव का उदाहरण बन गया है। ICC के फैसलों को लेकर अमेरिका का रुख पहले भी सख्त रहा है, और यह विवाद उसी तनाव को एक बार फिर सामने लाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की स्वतंत्रता और वैश्विक राजनीतिक ताकतों के बीच खींचतान आगे और तेज हो सकती है।

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