अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | 24 मार्च 2026
मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष के बीच अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की खबरों ने वैश्विक राजनीति को नई दिशा दे दी है, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा उलझी हुई नजर आ रही है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ “महत्वपूर्ण स्तर पर बातचीत” हो रही है और इसी आधार पर उन्होंने अपने सख्त अल्टीमेटम को 5 दिन के लिए टाल दिया। हालांकि, ईरान ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि कोई सीधी बातचीत नहीं हो रही है और वह अमेरिकी शर्तों को मानने के मूड में नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प भूमिका पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र निभा रहे हैं, जो दोनों देशों के बीच “मध्यस्थ” बनकर संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन देशों के विदेश मंत्री लगातार संपर्क में हैं और पर्दे के पीछे बातचीत जारी है, लेकिन यह सब अभी “अप्रत्यक्ष कूटनीति” तक ही सीमित है। पाकिस्तान ने तो यहां तक प्रस्ताव दे दिया है कि अगर दोनों पक्ष तैयार हों तो इस वार्ता की मेजबानी इस्लामाबाद में की जा सकती है।
हालांकि इस संभावित शांति प्रक्रिया के सामने कई बड़ी बाधाएं भी हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करे, मिसाइल कार्यक्रम सीमित करे और क्षेत्रीय संगठनों को समर्थन देना छोड़े। वहीं ईरान इन शर्तों को “एकतरफा दबाव” बताते हुए खारिज कर रहा है और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई जैसी मांगें भी उठा रहा है। इसके अलावा हालिया सैन्य हमलों, बड़े नेताओं की हत्या और गहरे अविश्वास ने हालात को और जटिल बना दिया है, जिससे किसी भी औपचारिक समझौते की राह मुश्किल दिख रही है।
जमीनी हकीकत यह है कि एक तरफ बमबारी और जवाबी हमले जारी हैं, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक चैनल भी खुले रखे गए हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे “दोहरी रणनीति” मान रहे हैं—जहां युद्ध और वार्ता साथ-साथ चल रहे हैं। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह मध्यस्थता वाकई युद्ध रोक पाएगी या फिर यह सिर्फ समय खरीदने की कूटनीति साबित होगी।




