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बचाने वाले को ही सज़ा?

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ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | देहरादून | 22 मार्च 2026

उत्तराखंड के मोहम्मद दीपक #MohammadDeepak मामले ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—क्या इस देश में अब वह आदमी भी कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा, जो नफरत के बीच खड़ा होकर भाईचारे की बात करता है? क्या शांति की अपील करना अब जोखिम भरा काम हो गया है? जिस व्यक्ति ने समाज में सौहार्द और एकता का संदेश देने की कोशिश की, वही आज खुद असुरक्षित खड़ा है। उसने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, सुरक्षा मांगी, अपनी जान के खतरे का हवाला दिया—लेकिन बदले में उसे क्या मिला? सुरक्षा से इनकार और सोशल मीडिया पर बोलने तक की रोक।

यह सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं है, एक बड़ा सामाजिक संकेत भी है। यह बताता है कि आज का माहौल कितना संवेदनशील और विभाजित हो चुका है, जहां “क्या कहा” से ज्यादा “किसने कहा” और “किसके लिए कहा” मायने रखने लगा है।

अदालत का सम्मान अपनी जगह है—और होना भी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि समाज यह समझे कि हर आवाज़ को “एजेंडा” या “उकसावा” मान लेना खतरनाक हो सकता है। अगर कोई आदमी नफरत के माहौल में खड़ा होकर शांति की बात करता है, तो क्या उसे संरक्षण मिलना चाहिए या प्रतिबंध?

इस मामले में सबसे चिंता की बात यह है कि धमकियों की चर्चा के बावजूद सुरक्षा नहीं दी गई। अगर कोई व्यक्ति सच में खतरे में है, तो क्या उसकी सुरक्षा प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? या फिर अब यह भी देखा जाएगा कि उसकी सोच, उसकी बात या उसका नाम किस खांचे में फिट बैठता है?

सोशल मीडिया पर जो प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, वे भी हमारे समाज का आईना हैं। एक तरफ लोग दीपक को “एंटी-नेशनल” कह रहे हैं, तो दूसरी तरफ कुछ लोग उसे “शांति का संदेशवाहक” बता रहे हैं। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है—लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उस सच्चाई को सुनने के लिए तैयार हैं?

आज जरूरत है ठहरकर सोचने की। अगर हर उस आवाज़ को दबा दिया जाएगा जो जोड़ने की कोशिश करती है, तो फिर बचा क्या रहेगा? सिर्फ शोर, आरोप और विभाजन?

“बचाने वाले को ही सज़ा?”—यह सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि हमारे समय का सबसे बड़ा द्वंद्व है। अगर इसका जवाब हमने आज नहीं खोजा, तो कल शायद बहुत देर हो जाएगी।

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