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UNI दफ्तर सील: दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, क्या जमीन के खेल में अडानी की होगी एंट्री?

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राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 मार्च 2026

देश की पुरानी समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया (UNI) को बड़ा झटका लगा है। Delhi High Court ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें UNI ने केंद्र सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें रफी मार्ग स्थित जमीन खाली करने को कहा गया था। कोर्ट के फैसले के बाद अब इस प्रॉपर्टी पर UNI का अधिकार समाप्त हो गया है और दफ्तर को सील कर दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि में जाएं तो यह जमीन UNI को एक समाचार एजेंसी के कार्यालय निर्माण के लिए आवंटित की गई थी। लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद वहां निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया। L&DO ने कई बार नोटिस और रिमाइंडर जारी किए, लेकिन जब कोई ठोस प्रगति नहीं हुई तो आवंटन रद्द कर दिया गया।

UNI ने इस फैसले को अदालत में चुनौती देते हुए दलील दी कि निर्माण में देरी फंड की कमी और बिल्डिंग प्लान की मंजूरी में विलंब के कारण हुई। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट कहा गया कि आवंटन की शर्तों का पालन करना एजेंसी की जिम्मेदारी थी और ऐसा न होने पर जमीन वापस लेना पूरी तरह वैध है।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि UNI अपने मूल स्वरूप में नहीं रह गई है और उसका अधिग्रहण एक निजी कंपनी द्वारा किया जा चुका है। अदालत ने सभी तथ्यों पर विचार करते हुए याचिका खारिज कर दी और L&DO के फैसले को सही ठहराया।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने कई अहम सवाल भी खड़े कर दिए हैं।क्या यह महज एक प्रशासनिक कार्रवाई है या इसके पीछे कोई बड़ा खेल छिपा है? राजधानी के प्राइम लोकेशन पर स्थित इस जमीन का अगला उपयोग क्या होगा? क्या इसे किसी सरकारी संस्था को दिया जाएगा या निजी हाथों में सौंपा जाएगा?

कुछ हलकों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि क्या इस तरह की कार्रवाईयों के जरिए बड़े कॉरपोरेट समूहों—जैसे Adani Group—के लिए जमीन तैयार की जा रही है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह पूरा मामला सामने आया है, उसने बहस को जरूर जन्म दे दिया है।

मीडिया जगत में इस फैसले को लेकर चिंता भी जताई जा रही है। क्या यह कदम स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए एक संकेत है कि संसाधनों और संरचनाओं पर दबाव बढ़ रहा है? क्या आर्थिक रूप से कमजोर मीडिया संस्थानों के लिए अस्तित्व बनाए रखना अब और कठिन होता जा रहा है?

फिलहाल अदालत का फैसला साफ है—नियमों का उल्लंघन हुआ, तो आवंटन रद्द होगा। लेकिन इस फैसले के दूरगामी राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव क्या होंगे, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट हो पाएगा।

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