ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 मार्च 2026
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सच और छवि के बीच की दूरी खतरनाक रूप से बढ़ती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भारत के प्रतिनिधि यह कहते हैं कि यहां धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता, तो यह सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन सवाल यह है—क्या यह पूरी सच्चाई है, या सिर्फ एक चमकदार प्रस्तुति?
सच्चाई यह है कि देश के भीतर का माहौल कई बार उस दावे के उलट नजर आता है। सोशल मीडिया खोलिए, खबरें देखिए, ज़मीनी घटनाओं को समझिए—तो बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जो यह सवाल उठाती हैं कि क्या वाकई सब कुछ उतना ही संतुलित और न्यायपूर्ण है, जैसा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बताया जाता है?
यह सिर्फ छवि का मामला नहीं है, यह भरोसे का मामला है। जब सरकार बाहर जाकर दुनिया को एक आदर्श तस्वीर दिखाती है और अंदर हालात उस तस्वीर से मेल नहीं खाते, तो सवाल उठना लाज़मी है। क्या यह सिर्फ कूटनीतिक मजबूरी है या फिर सच्चाई से आंख चुराने की कोशिश?
सबसे गंभीर आरोप यह है कि देश में बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं को या तो नजरअंदाज किया जा रहा है या उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, जितनी ली जानी चाहिए। और जब आम आदमी यह महसूस करने लगे कि न्याय का तराजू बराबर नहीं है, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने लगती है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi और उनकी सरकार पर यह आरोप नया नहीं है कि वे छवि निर्माण में माहिर हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ छवि से देश चलता है? क्या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए भाषण, जमीन पर लोगों के अनुभवों को बदल सकते हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या दुनिया अब भी इन बातों पर आंख मूंदकर भरोसा करेगी? आज वैश्विक संस्थाएं, मानवाधिकार संगठन और विदेशी मीडिया भारत के अंदरूनी हालात पर नजर रख रहे हैं। ऐसे में अगर बयान और हकीकत के बीच फर्क बढ़ता गया, तो इसका असर सिर्फ राजनीति पर नहीं, बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय साख पर भी पड़ेगा।
यह भी समझना होगा कि आलोचना देश विरोध नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र की ताकत होती है। जो सरकार आलोचना से डरती है, वह अपने ही बनाए आईने से डर रही होती है। और जो आईना दिखा रहा है, उसे तोड़ देने से चेहरा नहीं बदलता।
आज जरूरत है ईमानदारी की—बयान में नहीं, काम में। अगर वाकई भारत को दुनिया के सामने एक मजबूत, न्यायपूर्ण और समावेशी देश के रूप में पेश करना है, तो सबसे पहले उस सच्चाई को जमीन पर उतारना होगा। वरना यह दोहरापन एक दिन इतना बड़ा सवाल बन जाएगा, जिसका जवाब सिर्फ भाषणों से नहीं दिया जा सकेगा।




