एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 14 मार्च 2026
देश में इस समय रसोई गैस को लेकर गंभीर संकट की स्थिति दिखाई दे रही है। कई जगहों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि लोग सिलेंडर के लिए एजेंसियों के चक्कर लगा रहे हैं, घंटों लंबी लाइनों में खड़े हैं और फिर भी उन्हें गैस नहीं मिल पा रही। ऐसे समय में स्वाभाविक अपेक्षा यह होती है कि देश की सर्वोच्च कार्यपालिका—सरकार और प्रधानमंत्री—संसद में मौजूद रहकर स्थिति की समीक्षा करें, विपक्ष के सवालों का जवाब दें और समाधान की दिशा में स्पष्ट नीति सामने रखें। लेकिन इसी दौर में प्रधानमंत्री Narendra Modi का चुनावी रैलियों और रोड शो में लगातार व्यस्त दिखाई देना राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। असम में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस ने “नॉर्थ ईस्ट” को अपने हाल पर छोड़ दिया था। यह बयान सुनते ही स्वाभाविक रूप से कई सवाल उठते हैं, क्योंकि नॉर्थ ईस्ट का ही एक राज्य Manipur पिछले लंबे समय से हिंसा और अशांति की आग में झुलस रहा है। पिछले दो वर्षों में वहां सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, हजारों लोग विस्थापित हुए हैं और महिलाओं के साथ अमानवीय घटनाओं की तस्वीरें पूरे देश ने सोशल मीडिया पर देखी हैं। ऐसे हालात में जब नॉर्थ ईस्ट की तरक्की की बात की जाती है, तो यह सवाल भी उठता है कि क्या मणिपुर उस चर्चा का हिस्सा है या नहीं।
आलोचकों का कहना है कि यदि कोई नेता नॉर्थ ईस्ट के विकास की बात करता है तो उसे मणिपुर की स्थिति पर भी उतनी ही स्पष्टता से बोलना चाहिए। जब किसी क्षेत्र में हिंसा, अव्यवस्था और सामाजिक तनाव लंबे समय तक जारी रहे, तो स्वाभाविक है कि जनता यह उम्मीद करती है कि देश का सर्वोच्च नेतृत्व उस पर खुलकर अपनी बात रखे। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वर्तमान केंद्र सरकार को सत्ता में आए एक दशक से अधिक समय हो चुका है।
प्रधानमंत्री की राजनीतिक शैली को लेकर यह बहस नई नहीं है। अतीत में भी कई मौकों पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि संकट की घड़ी में भी सरकार का राजनीतिक अभियान जारी रहा। 2016 की नोटबंदी के दौरान बैंकों के बाहर लगी लंबी कतारें हों या कोविड-19 महामारी के दौरान चुनावी रैलियों को लेकर उठे सवाल—इन सभी घटनाओं पर देश में व्यापक बहस होती रही है। समर्थक और आलोचक इन घटनाओं को अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते हैं, लेकिन डिजिटल युग में इन सबका रिकॉर्ड स्थायी रूप से मौजूद है।
आज की राजनीति का एक बड़ा सच यह भी है कि हर बयान, हर भाषण और हर घटना कैमरे में कैद हो जाती है। आने वाले वर्षों में नई पीढ़ी इन्हीं वीडियो, भाषणों और फैसलों के आधार पर नेताओं का मूल्यांकन करेगी। इतिहास का फैसला राजनीतिक नारों से नहीं बल्कि नीतियों, फैसलों और उनके सामाजिक प्रभाव से होता है।
आर्थिक नीतियों को लेकर भी सरकार पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। आलोचक नोटबंदी, जीएसटी की शुरुआती जटिलताओं और बढ़ती महंगाई जैसे मुद्दों को उठाते हुए कहते हैं कि इन फैसलों ने छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग पर भारी दबाव डाला। वहीं सरकार का पक्ष रहा है कि इन कदमों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को अधिक पारदर्शी और औपचारिक बनाना था। इसी तरह विदेश नीति को लेकर भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं—कुछ इसे सक्रिय और प्रभावशाली बताते हैं, जबकि आलोचक इसे अत्यधिक झुकाव वाली नीति कहकर सवाल उठाते हैं।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी राजनीतिक संघर्ष जारी है। विपक्ष समय-समय पर राफेल सौदे, इलेक्टोरल बॉन्ड्स और PM CARES फंड जैसे मामलों को उठाता रहा है, जबकि सरकार इन आरोपों को निराधार बताती रही है। इसके साथ ही केंद्रीय जांच एजेंसियों—CBI और ED—के इस्तेमाल को लेकर भी विपक्ष सरकार पर राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप लगाता है, जबकि सरकार का कहना है कि एजेंसियां कानून के अनुसार काम कर रही हैं।
लोकतंत्र का सार यही है कि सत्ता से सवाल पूछे जाएं। सत्ता अपने फैसलों का बचाव करती है और विपक्ष उसकी आलोचना करता है। लेकिन हर दौर का राजनीतिक व्यवहार भविष्य के इतिहास में दर्ज होता है। आने वाली पीढ़ियां यह नहीं देखेंगी कि किसने कितने भाषण दिए, बल्कि यह देखेंगी कि संकट के समय नेतृत्व ने कैसी जिम्मेदारी निभाई और देश पर उसके फैसलों का क्या असर पड़ा।
इसलिए असली सवाल आज भी वही है—जब देश के सामने गंभीर चुनौतियां हों, तब राजनीति की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? और जब इतिहास पीछे मुड़कर इस दौर को देखेगा, तो वह इन फैसलों और व्यवहारों को किस नज़र से याद करेगा। यही प्रश्न भविष्य की पीढ़ियां हमसे भी पूछेंगी।




