एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 6 फरवरी 2026
अहिंसा की कसौटी पर खरा उतरा एक जीवन
“मुसलमान सीने पर गोली खाता है, उसकी पीठ पर एक भी निशान नहीं मिलेगा।” यह वाक्य केवल एक कथन नहीं, बल्कि उस जीवन-दर्शन का सार है, जिसे खान अब्दुल गफ्फार खान ने पूरी निष्ठा के साथ जिया। आज, उनके जन्मदिन पर, देश उस महान स्वतंत्रता सेनानी को याद कर रहा है जिसने 98 वर्षों के जीवन में 35 वर्ष जेल में बिताए, लेकिन न कभी झुका, न डिगा और न ही अपने सिद्धांतों से समझौता किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि साहस केवल हथियार उठाने में नहीं, बल्कि अन्याय के सामने सत्य और अहिंसा के साथ खड़े रहने में भी होता है।
‘सीमांत गांधी’: नाम नहीं, एक वैचारिक क्रांति
दुनिया उन्हें “सीमांत गांधी” के नाम से जानती है। यह उपनाम उनके व्यक्तित्व और संघर्ष का सहज परिचय देता है। पेशावर और खैबर जैसे इलाकों में, जहां बंदूक संस्कृति गहराई से रची-बसी थी, गफ्फार खान ने अहिंसा का रास्ता चुना। उन्होंने दिखाया कि जिन भूभागों को हिंसा का पर्याय मान लिया जाता है, वहीं शांति की सबसे मजबूत इमारत खड़ी की जा सकती है। वे एक व्यक्ति भर नहीं थे, बल्कि एक विचार थे—ऐसा विचार जो डर को तोड़ता और इंसानियत को जोड़ता है।
खुदाई खिदमतगार: लाल कुर्तों की निडर सेना
गफ्फार खान ने खुदाई खिदमतगार आंदोलन की स्थापना की। लाल कुर्ते पहनने वाले ये स्वयंसेवक हथियारों से नहीं, बल्कि अनुशासन, सत्य और सेवा-भाव से लैस थे। यह आंदोलन ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध का एक अनूठा उदाहरण बना। सीमांत प्रांत में, जहां हिंसा को स्वाभाविक माना जाता था, खुदाई खिदमतगारों ने शांति और सामाजिक सुधार का संदेश फैलाया और यह साबित किया कि अहिंसा कमजोरों का नहीं, बल्कि सबसे साहसी लोगों का मार्ग है।
ब्रिटिश हुकूमत के लिए सबसे बड़ा ‘ख़तरा’
अंग्रेज़ी शासन गफ्फार खान को इसलिए सबसे खतरनाक मानता था क्योंकि वे नफरत नहीं, जागरूकता फैला रहे थे। उन्होंने शिक्षा को हथियार बनाया, समाज सुधार को अपना मिशन और इंसानियत को मजहब से ऊपर रखा। उनके लिए स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं थी, बल्कि समाज के नैतिक उत्थान की प्रक्रिया थी। यही वजह थी कि बार-बार जेल भेजे जाने के बावजूद उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ।
विभाजन का विरोध और टूटे दिल की पुकार
भारत के विभाजन का उन्होंने खुलकर विरोध किया। वे इंसानों को सरहदों में बंटता नहीं देखना चाहते थे। उनका कथन—“आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया”—केवल राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसे नेता की पीड़ा थी जो इंसानी रिश्तों के टूटने से आहत था। विभाजन के बाद भी उन्होंने अहिंसा और शांति के मार्ग को नहीं छोड़ा, भले ही परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न रही हों।
आज के समय के लिए अमूल्य संदेश
आज, जब विचारधाराएँ अक्सर नफरत और ध्रुवीकरण की आग में झुलसती दिखाई देती हैं, खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन हमें एक ठोस सबक देता है। वे याद दिलाते हैं कि असली बहादुरी विरोध को हिंसा से नहीं, बल्कि नैतिक साहस से परास्त करने में है। शांति की बात करना कठिन हो सकता है, लेकिन वही स्थायी समाधान का रास्ता भी है।
भारत रत्न: व्यक्ति नहीं, विचार का सम्मान
भारत ने 1987 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस सोच को दिया गया था जो सीमाओं, धर्मों और भाषाओं से परे है। यह उस अहिंसक परंपरा का सम्मान था, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक पहचान दी।
निष्कर्ष: सलाम उस योद्धा को
98 वर्षों की ज़िंदगी, 35 वर्ष जेल में, लेकिन एक भी दिन सिद्धांतों से समझौता नहीं—खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। आज उनके जन्मदिन पर देश उन्हें सलाम करता है—उस योद्धा को, जिसने साबित किया कि अहिंसा कायरों का रास्ता नहीं, बल्कि सबसे बड़े दिल वालों का हथियार है।




