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मोदी है तो मुमकिन है? भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत 13% बढ़ी—रॉयटर्स की रिपोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल

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एबीसी नेशनल न्यूज | 16 जनवरी 2026

भारत की वैश्विक छवि और लोकतांत्रिक सेहत को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स (Reuters) के हवाले से एक अमेरिकी रिसर्च ग्रुप की रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि 2025 में भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरे भाषणों (Anti-Minority Hate Speech) में 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि उस माहौल की ओर इशारा करता है, जिसमें समाज का एक बड़ा हिस्सा डर, असुरक्षा और भेदभाव के साए में जीने को मजबूर है।

रिपोर्ट के मुताबिक, नफरत फैलाने वाले भाषणों, बयानों और सार्वजनिक मंचों से दिए गए उकसाऊ संदेशों में लगातार इजाफा हुआ है। खास बात यह है कि इनमें से बड़ी संख्या ऐसे भाषणों की है, जो राजनीतिक रैलियों, चुनावी अभियानों, धार्मिक आयोजनों और सोशल मीडिया के ज़रिये फैलाई गई। अमेरिकी रिसर्च ग्रुप का दावा है कि इन भाषणों का सीधा निशाना भारत के धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यक समुदाय रहे हैं। इससे न केवल सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा, बल्कि जमीन पर हिंसा, बहिष्कार और डर का माहौल भी गहराया।

रॉयटर्स की इस रिपोर्ट ने सरकार के उस दावे पर भी सवाल खड़े किए हैं, जिसमें बार-बार कहा जाता है—“मोदी है तो मुमकिन है”। आलोचकों का कहना है कि अगर विकास और सुशासन मुमकिन है, तो फिर नफरत और विभाजन क्यों बढ़ रहा है? रिपोर्ट यह संकेत देती है कि नफरत भरे भाषण अक्सर बिना किसी ठोस कार्रवाई के खुलेआम दिए गए, जिससे यह संदेश गया कि ऐसे बयानों पर सख्ती नहीं होगी। यही वजह है कि नफरत फैलाने वालों के हौसले और बुलंद होते चले गए।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स नफरत फैलाने का बड़ा ज़रिया बनते जा रहे हैं। भड़काऊ वीडियो, फर्जी खबरें, सांप्रदायिक संदेश और ट्रोल अभियानों ने माहौल को और ज़हरीला किया। कई मामलों में शिकायतों के बावजूद न तो त्वरित कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदार लोगों पर कोई प्रभावी कानूनी कदम उठाया गया। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या कानून सभी के लिए बराबर है, या फिर नफरत फैलाने वालों को राजनीतिक संरक्षण हासिल है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि नफरत भरे भाषण सिर्फ शब्द नहीं होते, बल्कि वे हिंसा की ज़मीन तैयार करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई सांप्रदायिक घटनाओं, मॉब लिंचिंग, सामाजिक बहिष्कार और धमकियों को इसी माहौल से जोड़कर देखा जा रहा है। रिपोर्ट यह भी इशारा करती है कि जब शीर्ष स्तर पर सख्त संदेश नहीं जाता, तो निचले स्तर पर हालात और बिगड़ते हैं।

यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब भारत खुद को दुनिया के सामने लोकतंत्र की जननी और विश्वगुरु के रूप में पेश करता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार आ रही ऐसी रिपोर्टें भारत की छवि को नुकसान पहुंचा रही हैं। सवाल साफ है—क्या भारत “अच्छे दिन” से फिसलकर “नफरत के दिन” की ओर बढ़ रहा है? और अगर हां, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

रॉयटर्स की इस रिपोर्ट ने एक बार फिर पूरे देश को आईना दिखाया है। अब फैसला सरकार, संस्थानों और समाज के हाथ में है कि वह इस चेतावनी को गंभीरता से लेता है या इसे भी बाकी रिपोर्टों की तरह नज़रअंदाज़ कर देता है। क्योंकि नफरत अगर आज शब्दों में है, तो कल वह सड़कों पर उतर सकती है—और तब नुकसान सिर्फ अल्पसंख्यकों का नहीं, पूरे देश का होगा।

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