संजीव कुमार | नई दिल्ली | 12 जनवरी 2026
भारतीय क्रिकेट से जुड़े एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन में बांग्लादेश के स्टार तेज़ गेंदबाज़ मुस्तफिजुर रहमान को बाहर किए जाने के फैसले ने अब क्रिकेट से आगे बढ़कर राजनीति, दबाव और दोहरे मापदंड की बहस छेड़ दी है। इस फैसले के पीछे जो तर्क सामने आया, वह बेहद गंभीर था—बांग्लादेश में लगातार हिंदुओं के खिलाफ हिंसा, हिंदुओं के मारे जाने की खबरें और वहां का बिगड़ता सामाजिक माहौल। इसी आधार पर यह कहा गया कि बांग्लादेश से जुड़े हर तरह के संबंधों पर पुनर्विचार होना चाहिए। लेकिन यही तर्क उस वक्त सवालों के घेरे में आ जाता है, जब उसी बांग्लादेश के एक अंपायर को भारत आने की अनुमति दे दी जाती है। सवाल सीधा है—अगर देश की स्थिति इतनी ही गंभीर थी कि खिलाड़ी को बाहर करना पड़ा, तो फिर अंपायर के लिए वही देश अचानक “सुरक्षित” कैसे हो गया?
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान यह भी चर्चा में रहा कि सोशल मीडिया पर भारी दबाव बनाया गया, भावनाएं भड़काई गईं और यहां तक कि फिल्म अभिनेता शाहरुख़ ख़ान को भी गालियां दी गईं, क्योंकि वह कोलकाता नाइट राइडर्स से जुड़े हैं। आरोप यह लगाए गए कि सार्वजनिक और भावनात्मक दबाव के बीच अंततः संदेश गया—“बांग्लादेशी खिलाड़ी को बाहर करो।” इसी क्रम में कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम से मुस्तफिजुर रहमान को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हालांकि इन दावों पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया, लेकिन सवाल यह है कि अगर विरोध बांग्लादेश में हो रही कथित हिंसा के खिलाफ था, तो फिर यह विरोध सिर्फ एक खिलाड़ी पर ही क्यों उतरा?
यह विरोधाभास और भी गहरा हो जाता है जब देखा जाता है कि अंपायर भी बांग्लादेशी है और खिलाड़ी भी बांग्लादेशी। न अंपायर पर किसी तरह की हिंसा फैलाने का आरोप है, न खिलाड़ी पर। दोनों पेशेवर हैं, दोनों अपने-अपने काम के लिए आ रहे थे। फिर ऐसा कैसे हुआ कि एक को “माहौल, सुरक्षा और संवेदनशीलता” के नाम पर बाहर कर दिया गया, जबकि दूसरे को भारत आने में कोई दिक्कत नहीं हुई? अगर कहा गया कि बांग्लादेश में हो रही हिंसा के विरोध में बांग्लादेश से सभी तरह के संबंध तत्काल खत्म कर देने चाहिए, तो फिर यह फैसला आधा-अधूरा क्यों रहा? क्या विरोध चुनिंदा चेहरों तक सीमित था?
ICC के नियमों की बात करें तो वे साफ कहते हैं कि खिलाड़ी और अंपायर की नियुक्ति और यात्रा मंजूरी की प्रक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन मूल सिद्धांत समान रहते हैं—संबंधित बोर्ड की अनुमति, सुरक्षा व लॉजिस्टिक क्लीयरेंस और आयोजन की निष्पक्षता। यही वजह है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन नियमों का इस्तेमाल चयनात्मक तरीके से किया गया? खिलाड़ी के मामले में सख्ती और अंपायर के मामले में नरमी—क्या यह ICC की स्वतंत्रता है या फिर दबाव के आगे झुकने की मजबूरी?
आलोचकों का कहना है कि यह पूरा मामला क्रिकेट से ज्यादा पावर गेम की तरह दिखता है। खिलाड़ी सबसे आसान निशाना बनता है, क्योंकि उसे बाहर करने से सिस्टम पर सीधा असर नहीं पड़ता। अंपायर ICC के सीधे नियंत्रण में होते हैं, इसलिए उन्हें हटाने का मतलब होता—ICC की अपनी व्यवस्था पर सवाल। शायद यही वजह है कि एक को बलि का बकरा बना दिया गया और दूसरे को छूट मिल गई। यह स्थिति ICC की निष्पक्षता पर नहीं, बल्कि उसकी सुविधाजनक नैतिकता पर सवाल खड़े करती है।
इस फैसले ने बांग्लादेश क्रिकेट जगत में भी नाराज़गी पैदा की है। वहां के फैंस पूछ रहे हैं कि देश का अहम खिलाड़ी बाहर बैठा है, लेकिन उसी देश का अंपायर अंतरराष्ट्रीय मंच पर मौजूद है—तो यह सम्मान है या अपमान? कई लोगों का मानना है कि इससे बांग्लादेशी खिलाड़ियों को यह संदेश जाता है कि वे राजनीति और दबाव के सामने सबसे कमजोर कड़ी हैं। यह न सिर्फ प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन बिगाड़ता है, बल्कि खिलाड़ियों के मनोबल को भी तोड़ता है।
अब यह मामला सिर्फ मुस्तफिजुर रहमान तक सीमित नहीं रहा। यह ICC की पारदर्शिता, नियमों की समानता और दोहरे मापदंड की परीक्षा बन चुका है। अगर किसी देश की स्थिति के आधार पर खिलाड़ी को बाहर किया गया, तो उसी आधार पर अंपायर को क्यों नहीं रोका गया? और अगर अंपायर सुरक्षित था, तो खिलाड़ी असुरक्षित कैसे हो गया? इस पर ICC की चुप्पी खुद एक बड़ा सवाल बनती जा रही है। सवाल बेहद सीधा है—क्या ICC के नियम सभी देशों, सभी भूमिकाओं और सभी लोगों के लिए बराबर हैं, या फिर फैसले दबाव, भावनाओं और पावर के हिसाब से बदले जाते हैं? क्रिकेट खुद को “जेंटलमैन गेम” कहता है, लेकिन ऐसे फैसले इस दावे को गहरी चोट पहुंचाते हैं। मुस्तफिजुर रहमान का बाहर होना अब सिर्फ एक खिलाड़ी का मामला नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट प्रशासन की विश्वसनीयता की खुली परीक्षा बन चुका है।




