अवधेश कुमार | नई दिल्ली 26 दिसंबर 2025
2012 की ठंडी दिसंबर की रात दिल्ली की सड़कों पर जो उबाल दिखा था, वह सिर्फ एक अपराध के खिलाफ आक्रोश नहीं था, वह पूरे सिस्टम के खिलाफ एक सामूहिक चीख थी। निर्भया कांड ने देश की आत्मा को इस कदर झकझोरा कि छात्र, महिलाएं, बुज़ुर्ग, कामकाजी आदमी—हर वर्ग सड़कों पर उतर आया। इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक जनता का गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। पुलिस की लाठियां, पानी की बौछारें और आंसू गैस भी उस जनाक्रोश को रोक नहीं सकीं। उस वक्त सत्ता में कांग्रेस सरकार थी और जनता का सीधा गुस्सा सरकार, पुलिस व्यवस्था और न्यायिक ढिलाई पर था। मीडिया 24 घंटे सवाल पूछ रहा था, स्टूडियो से लेकर सड़क तक बहस थी और संसद से अदालत तक दबाव बना।
उस जनदबाव का असर भी दिखा। फास्ट ट्रैक कोर्ट बने, कानून बदले गए, निर्भया फंड बना, और यौन अपराधों पर सज़ा को कड़ा किया गया। यानी जनता के गुस्से ने व्यवस्था को झुकने पर मजबूर किया। लेकिन सवाल यह है कि वही देश, वही समाज, वही अपराध—2014 के बाद क्यों अलग प्रतिक्रिया देने लगा?
2014 के बाद भी देश ने एक के बाद एक जघन्य बलात्कार कांड देखे। प्रज्वल रेवन्ना पर लगे गंभीर यौन शोषण के आरोप हों, जहां सैकड़ों महिलाओं के शोषण और वीडियो रिकॉर्डिंग की बातें सामने आईं—देश वैसा नहीं उबला जैसा 2012 में उबला था। मामला गंभीर था, सत्ता से जुड़े प्रभावशाली नाम थे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर न तो वैसा जनसैलाब दिखा, न ही लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन। खबरें आईं, बहस हुई, फिर धीरे-धीरे शोर कम हो गया।
हाथरस की दलित बेटी के साथ हुई दरिंदगी ने भी देश को अंदर तक हिला देना चाहिए था। एक युवती, एक दलित परिवार, पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल, रातों-रात अंतिम संस्कार, परिवार की घेराबंदी—सब कुछ था जो एक नए निर्भया आंदोलन को जन्म दे सकता था। लेकिन वह गुस्सा कुछ दिनों की सोशल मीडिया बहस और सीमित प्रदर्शनों में सिमट गया। सत्ता से सवाल पूछने वालों पर ही सवाल उठने लगे, पीड़िता के परिवार को ही शक की नजर से देखा जाने लगा।
उन्नाव रेप केस में तो स्थिति और भी भयावह थी। आरोपी कोई आम आदमी नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल का प्रभावशाली विधायक कुलदीप सिंह सेंगर था। पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में मौत, गवाहों की रहस्यमयी मौतें, पीड़िता के परिवार का सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होना—ये सब किसी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं थे। इसके बावजूद देशव्यापी उबाल नहीं दिखा। सवाल उठे, लेकिन वे धीरे-धीरे दबते चले गए।
तो आखिर बदला क्या?
सबसे बड़ा बदलाव है राजनीति का ध्रुवीकरण। 2012 में गुस्सा “सरकार” के खिलाफ था, लेकिन 2014 के बाद गुस्से को “राजनीतिक रंग” दे दिया गया। अगर सवाल सत्ता से पूछा जाए, तो पूछने वाले को देशद्रोही, एजेंडा चलाने वाला या विपक्षी खेमे का बता दिया जाता है। नतीजा यह हुआ कि आम आदमी डरने लगा—सड़क पर उतरने से, बोलने से, सवाल पूछने से।
दूसरा बड़ा कारण है मीडिया का बदलता चरित्र। निर्भया के समय मीडिया सत्ता से सवाल कर रहा था, आज का बड़ा हिस्सा सत्ता का बचाव करता नजर आता है। बलात्कार जैसे मुद्दे भी टीआरपी, चुनाव और धर्म की बहसों में दब जाते हैं। स्टूडियो में अपराध से ज्यादा यह तय किया जाता है कि “इससे किसे फायदा होगा।”
तीसरा कारण है समाज की संवेदनहीनता। लगातार हिंसा, लगातार खबरें और सोशल मीडिया की भीड़ ने इंसान को थका दिया है। आज गुस्सा ट्रेंड बनता है, आंदोलन नहीं। दो दिन ट्वीट, एक दिन बहस और फिर अगली खबर।
निर्भया ने देश को एकजुट किया था क्योंकि तब इंसानियत राजनीति से ऊपर खड़ी दिखी थी। आज वही इंसानियत पहचान, पार्टी और विचारधारा के बोझ तले दब गई है। सवाल यह नहीं है कि अपराध कम हुए या ज्यादा—सवाल यह है कि क्या हमारा ज़मीर अब भी उतना ही जिंदा है?क्योंकि जिस दिन देश बलात्कार पर चुप हो जाए, उस दिन खतरा सिर्फ बेटियों को नहीं, पूरे समाज को होता है।
जब नेता भगवान बन जाए, तो सवाल भी अपराध बन जाते हैं
मोदी की अंधभक्ति ने भी जन-आंदोलनों की ज़मीन को कमजोर किया है—यह एक कड़वा लेकिन जरूरी सच है। जब किसी प्रधानमंत्री को उसके समर्थक नेता नहीं, भगवान मानने लगें, तब हर सवाल, हर विरोध “आस्था पर हमला” घोषित कर दिया जाता है। ऐसे माहौल में जनविरोध इसलिए भी नहीं उभर पाता, क्योंकि डर यह होता है कि सच बोलने से “मोदी की छवि” को नुकसान पहुंचेगा। नतीजा यह कि अपराध पर गुस्से की जगह भक्तिभाव हावी हो जाता है, और न्याय की मांग राजनीति के शोर में दब जाती है। लोकतंत्र में सवाल सत्ता को मजबूत करते हैं, लेकिन जब भक्ति सवालों पर भारी पड़ जाए, तो चुप्पी ही सबसे बड़ा आंदोलन बन जाती है—और वही सबसे खतरनाक भी।




