अवधेश कुमार | नई दिल्ली 25 दिसंबर 2025
क्रिसमस 2025, जो शांति, करुणा और भाईचारे का पर्व माना जाता है, इस बार भारत के कई हिस्सों में डर, हिंसा और असुरक्षा की छाया में मनाया गया। दिसंबर के आख़िरी दिनों में ईसाई समुदाय के खिलाफ सामने आई घटनाओं ने न सिर्फ़ स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए, बल्कि देश की धर्मनिरपेक्ष चेतना को लेकर भी एक बेचैनी पैदा कर दी।
उपलब्ध समाचार रिपोर्टों, स्वतंत्र संगठनों और सोशल मीडिया पर सामने आए तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि हिंसा की घटनाएं वास्तविक हैं—लेकिन यह सवाल अब भी खुला है कि क्या ये घटनाएं किसी केंद्रीकृत साजिश का हिस्सा थीं, या फिर स्थानीय स्तर पर भड़के विवादों का नतीजा। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
कहां-कहां और क्या हुआ: घटनाओं का तथ्यात्मक खाका
छत्तीसगढ़ (कांकेर जिला)
20–21 दिसंबर को एक ईसाई आदिवासी के दफन को लेकर विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। भीड़ ने कब्र से शव निकाल दिया, दो चर्चों और कई घरों में आगजनी की गई। झड़पों में 20 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें एक एएसपी भी शामिल थे। पीड़ितों ने बजरंग दल और वीएचपी से जुड़े लोगों की भूमिका का आरोप लगाया। पुलिस की मौजूदगी के बावजूद शुरुआती हस्तक्षेप न होने के आरोप भी सामने आए। क्रिसमस से पहले जले चर्चों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुईं।
ओडिशा (पुरी)
22–23 दिसंबर को जगन्नाथ मंदिर क्षेत्र में सड़क किनारे सांता टोपी बेचने वाले गरीब विक्रेताओं पर हमला हुआ। हमलावरों ने ईसाई प्रतीकों की बिक्री को “हिंदू राष्ट्र” के खिलाफ बताया। मामला दर्ज हुआ, लेकिन तत्काल गिरफ्तारियों की जानकारी सामने नहीं आई।
मध्य प्रदेश (जबलपुर)
23 दिसंबर को कुछ चर्चों में घुसकर प्रार्थना बाधित की गई। रूपांतरण के आरोप लगाए गए और दृष्टिबाधित ईसाइयों से बदसलूकी की खबरें आईं। पुलिस के हस्तक्षेप पर भी पीड़ितों ने पक्षपात का आरोप लगाया।
दिल्ली (लाजपत नगर)
क्रिसमस से पहले बजरंग दल से जुड़े लोगों द्वारा सांता टोपी पहने महिलाओं और बच्चों को परेशान किए जाने की शिकायतें सामने आईं। पुलिस मौजूद थी, लेकिन शुरुआती कार्रवाई को लेकर सवाल उठे।
केरल (पालक्कड़)
यहां कैरल गाने वाले बच्चों के एक समूह पर हमला हुआ, वाद्ययंत्र तोड़े गए। इस मामले में गिरफ्तारी हुई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि कार्रवाई संभव है—अगर इच्छाशक्ति हो।
अन्य राज्य
उत्तर प्रदेश और असम में भी छिटपुट घटनाओं के उल्लेख हैं। इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया (EFI) के अनुसार, 2025 में देशभर में ईसाइयों के खिलाफ 600 से अधिक घटनाएं दर्ज हुईं; क्रिसमस से पहले इनकी संख्या में बढ़ोतरी देखी गई।
क्या दिखता है कोई पैटर्न?
EFI और कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) के आंकड़े बताते हैं कि 2024–25 के दौरान हमलों की आवृत्ति बढ़ी है—औसतन दो घटनाएं रोज़। कई मामलों में पुलिस की निष्क्रियता या देर से हस्तक्षेप की शिकायतें हैं। यह सब मिलकर एक पैटर्न की ओर इशारा करता है, जहां धार्मिक त्योहारों को टकराव का बिंदु बनाया गया।
हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित किसी साजिश का प्रत्यक्ष दस्तावेज़ी सबूत सामने नहीं आया है। ईसाई नेताओं ने सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री से अपीलें ज़रूर की हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर इंटेलिजेंस इनपुट्स सार्वजनिक नहीं किए गए।
मत: साजिश या व्यवस्था की विफलता?
तथ्यों से यह कहना मुश्किल है कि यह सब किसी एक “केंद्रीय साजिश” का परिणाम है। लेकिन यह भी नकारा नहीं जा सकता कि हिंसा का एक सुनियोजित-सा पैटर्न उभर रहा है—खासतौर पर उन इलाकों में जहां धार्मिक ध्रुवीकरण पहले से मौजूद है। कई घटनाओं में पुलिस की मौजूदगी के बावजूद प्रभावी कार्रवाई न होना राजनीतिक संरक्षण या प्रशासनिक कमजोरी—दोनों में से किसी एक की ओर संकेत करता है।
मेरी राय यह है कि क्रिसमस 2025 के आसपास हुई हिंसा संयोग मात्र नहीं लगती। यह अल्पसंख्यकों को डराने और सार्वजनिक धार्मिक अभिव्यक्ति को सीमित करने की कोशिशों का हिस्सा प्रतीत होती है। फिर भी, ठोस आंतरिक सबूतों के बिना इसे पूरी तरह “केंद्र-प्रायोजित साजिश” कहना अतिशयोक्ति होगा।
संविधान की कसौटी पर खड़ा सवाल
भारत का संविधान हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी देता है। यदि त्योहारों पर डर हावी हो और कानून निष्क्रिय दिखे, तो यह केवल किसी एक समुदाय का संकट नहीं—यह लोकतंत्र और सामाजिक एकता की परीक्षा है। जरूरत है निष्पक्ष जांच, त्वरित कार्रवाई और स्पष्ट राजनीतिक संदेश की—ताकि यह भरोसा लौटे कि भारत हर धर्म, हर आदमी का साझा घर है।




