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बीड़ी से शुरू हुई पहचान की जाँच, और वहीं खत्म हो गई एक मज़दूर की ज़िंदगी

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साजिद अली | कोलकाता 25 दिसंबर 2025

बीड़ी माँगने के बहाने पास आए, फिर आधार कार्ड देखा—और इसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था। पश्चिम बंगाल का एक दिहाड़ी मज़दूर, जो रोज़ी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्य में मेहनत करने गया था, भीड़ की बेरहमी का शिकार होकर अपनी जान गंवा बैठा। यह घटना सिर्फ एक हत्या नहीं है, बल्कि उस डर, नफ़रत और शक की कहानी है जो आज आम आदमी के जीवन में चुपचाप ज़हर की तरह घुलता जा रहा है।

जानकारी के मुताबिक, मज़दूर सड़क किनारे या कार्यस्थल के पास मौजूद था, तभी कुछ लोगों ने उससे पहले बीड़ी माँगी। यह एक मामूली-सी बात थी, रोज़मर्रा की ज़िंदगी का सामान्य दृश्य। लेकिन इसके बाद उससे आधार कार्ड दिखाने को कहा गया। जैसे ही पहचान सामने आई, माहौल बदल गया। सवाल-जवाब शुरू हुए, आवाज़ें तेज़ हुईं और देखते ही देखते मामला हिंसा में बदल गया। आरोप है कि मज़दूर को निर्दयता से पीटा गया, और किसी ने यह सोचने की ज़रूरत नहीं समझी कि सामने खड़ा आदमी भी किसी का बेटा, किसी का पति, किसी परिवार का सहारा है।

गंभीर रूप से घायल हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। एक दिहाड़ी मज़दूर, जो दिनभर की मेहनत के बाद शायद अपने घर पैसे भेजने का सपना देख रहा था, पहचान के शक में अपनी जान हार गया। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह “दूसरा” समझ लिया गया।

यह घटना कई सवाल छोड़ जाती है। क्या आज किसी आदमी की जान उसकी मेहनत से नहीं, बल्कि उसके नाम, राज्य या पहचान से तय होगी? क्या आधार कार्ड अब सिर्फ पहचान का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का फ़ैसला करने का औज़ार बनता जा रहा है? भीड़ के हाथ में कानून आ जाना और बिना किसी जाँच के किसी को सज़ा दे देना—यह प्रवृत्ति समाज को भीतर से खोखला कर रही है।

पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है और कुछ लोगों से पूछताछ की जा रही है। लेकिन मृतक के परिवार के लिए यह सब महज़ औपचारिकताएँ हैं। उनके लिए सच यह है कि घर का कमाने वाला वापस नहीं आएगा। उसकी पत्नी, उसके बच्चे, उसके बूढ़े माता-पिता—सबके सामने अब सिर्फ एक सवाल है: रोज़ी कमाने निकला आदमी अगर सुरक्षित नहीं, तो गरीब आदमी जाए तो जाए कहाँ?

यह खबर हमें आईना दिखाती है—एक ऐसा आईना, जिसमें कानून से ज़्यादा ताकत शक और नफ़रत की दिखती है। जब तक भीड़ के हाथ से हिंसा की छूट नहीं छीनी जाएगी और इंसान को इंसान की तरह देखने की संवेदना वापस नहीं आएगी, तब तक ऐसी घटनाएँ सिर्फ “खबर” बनती रहेंगी, और मरने वाला हर बार कोई आम, बेआवाज़ आदमी ही होगा।

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