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नॉन-बायोलॉजिकल ज्ञानगुरु की पाठशाला में कंगना का लेक्चर: मनरेगा, गांधी और ‘रघुपति राघव’ का नया एंथम-सिलेबस

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एबीसी डेस्क | 17 दिसंबर 2025

भारतीय जनता पार्टी में “ज्ञान” कोई साधारण अवधारणा नहीं, एक चलायमान दर्शन है—जो समय, तर्क और तथ्यों की सीमाओं से मुक्त होकर जहां चाहे वहां प्रकट हो सकता है। कभी यह बादलों के पीछे छिपे रडार में दिखाई देता है, कभी नाली की गैस से चाय बनवाने की वैज्ञानिक खोज में, कभी नॉन-बायोलॉजिकल अस्तित्व के आत्मकथात्मक खुलासे में, और अब सीधे सरकारी योजनाओं के नामकरण की प्रयोगशाला में। इस विराट ज्ञान-परंपरा के सर्वोच्च आचार्य हैं महामहिम प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी, जिन्होंने स्वयं देश को यह ऐतिहासिक सूचना दी कि वे सामान्य जैविक प्रक्रिया से उत्पन्न नहीं हुए। जब गुरु ही ऐसे हों, तो शिष्यों से क्या अपेक्षा—ज्ञान की गंगा तो बहेगी ही। इसी परंपरा की नवीनतम तेज़ धारा हैं भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत, जिन्होंने इस बार महात्मा गांधी, राष्ट्रगान, भजन और मनरेगा—चारों को एक ही वैचारिक प्रेज़ेंटेशन में समेट दिया।

मनरेगा का नाम बदलकर ‘VB-G Ram G’ करने के प्रस्ताव के समर्थन में कंगना रनौत ने जिस तर्क-विधान का प्रदर्शन किया, उसने राजनीतिक बहस को अचानक इतिहास, भक्ति-साहित्य और राष्ट्रगान की मिश्रित कक्षा में पहुंचा दिया। कंगना के अनुसार ‘रघुपति राघव राजा राम’ वह भजन है जिसे गांधी जी प्रार्थना सभाओं में गाया करते थे और उसी से प्रेरित होकर योजना का नया नाम गांधी के विज़न को आगे बढ़ाता है। इतना ही नहीं, ज्ञान की धारा को और ऊंचाई पर ले जाते हुए कंगना ने यह भी स्पष्ट किया कि गांधी जी ने इस भजन को “नेशनल एंथम” की तरह अपनाया था—मानो दशकों से देश किसी भ्रम में जी रहा था और अब जाकर असली सच्चाई से परिचित हुआ हो। ऐसे में मनरेगा के अधिकार-आधारित ढांचे, रोजगार की गारंटी या सामाजिक सुरक्षा जैसे सवाल गौण हो गए; मुख्य मुद्दा यह बन गया कि गांधी जी किस धुन में क्या गुनगुनाते थे और उसी के आधार पर सरकारी योजनाओं के नाम कैसे तय होने चाहिए।

कंगना रनौत का यह बयान कोई अपवाद नहीं, उसी वैचारिक सिलसिले की अगली कड़ी है, जहां इतिहास, विज्ञान, धर्म और प्रशासन एक-दूसरे में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि अलग-अलग पहचान ही खो बैठते हैं। बादलों में रडार की खोज से लेकर नॉन-बायोलॉजिकल जीवन दर्शन तक और अब भजन के सहारे सरकारी योजना का नाम बदलने तक—यह सब उसी प्रयोगशाला के उत्पाद हैं, जहां तर्क से ज़्यादा आत्मविश्वास की कीमत होती है। यहां यह सवाल महत्वहीन हो जाता है कि मनरेगा करोड़ों गरीबों की रोज़ी-रोटी से जुड़ी योजना है; असली महत्व इस बात का होता है कि उसका नाम किस कथा, किस भजन और किस प्रतीक में फिट बैठता है।

फिलहाल सरकार की ओर से मनरेगा का नाम बदलने पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन इस बहस ने एक बात पूरी तरह साफ कर दी है—देश में योजनाओं का भविष्य अब आर्थिक आंकड़ों, ज़मीनी ज़रूरतों या सामाजिक हकीकत से कम, और भजन, प्रतीक तथा ‘ज्ञान’ की नई परिभाषा से ज़्यादा तय होगा। सवाल बस इतना है कि अगली बार जब कोई योजना बदली जाएगी, तो क्या उसके लिए भी इतिहास, भक्ति और विज्ञान—तीनों को एक साथ बुलाया जाएगा, या फिर यह विशेष सम्मान सिर्फ कुछ चुनिंदा योजनाओं और चुनिंदा नेताओं के लिए ही सुरक्षित रहेगा।

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