केरल के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों को लेकर बीजेपी द्वारा दिखाई जा रही “उछाल” और “ब्रेकथ्रू” की तस्वीर पर विपक्ष ने तीखा सवाल खड़ा कर दिया है। आंकड़ों की बारीकी से पड़ताल करें तो साफ हो जाता है कि जिस जीत का शोर मचाया जा रहा है, वह दरअसल सियासी स्पिन से ज्यादा कुछ नहीं है। अंतिम नतीजों में एनडीए के खाते में 0 जिला पंचायत, 0 ब्लॉक पंचायत, नगरपालिकाओं में सिर्फ 2 सीटें और एक मात्र कॉरपोरेशन दिखाकर इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया जा रहा है। केरल जैसे राजनीतिक रूप से सजग राज्य में इसे “ब्रेकथ्रू” कहना खुद में हकीकत से मुंह चुराने जैसा है।
इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी यह है कि केरल की जनता बीजेपी से कितनी तेजी से मोहभंग करती है। 2024 के त्रिशूर लोकसभा चुनाव में मिली जीत को बीजेपी ने राज्य में अपनी स्वीकार्यता का प्रमाण बताया था, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में वही त्रिशूर कॉरपोरेशन यूडीएफ की झोली में भारी बहुमत से चला गया। इतना ही नहीं, बीजेपी का वोट शेयर भी 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में करीब 5 प्रतिशत गिर गया, जो इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी का कथित विस्तार जमीन पर टिक नहीं पा रहा।
अगर बीजेपी अपने “विकास” की बात करती है तो वह भी आंकड़ों के सामने फीकी पड़ जाती है। पिछली बार जहां उसके पास 941 ग्राम पंचायतों में से 19 थीं, वहीं इस बार वह 26 तक पहुंची—यानी कुल मिलाकर सिर्फ 7 ग्राम पंचायतों का इजाफा। इसे लहर या उभार बताना, केरल की राजनीतिक समझ का अपमान करने जैसा है।
वहीं दूसरी ओर, इस चुनाव का असली और निर्विवाद जनादेश कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के पक्ष में गया है। यूडीएफ ने हर स्तर पर शानदार वापसी और वर्चस्व दर्ज किया है। उसने 6 में से 4 कॉरपोरेशन जीतकर (+3), 14 में से 7 जिला पंचायतों पर कब्जा किया (+4), 86 में से 54 नगरपालिकाओं में जीत हासिल की (+12), 86 में से 79 ब्लॉक पंचायतों में दबदबा बनाया (+39) और ग्रामीण केरल में 505 ग्राम पंचायतों के साथ मजबूत पकड़ स्थापित की (+164)। यह प्रदर्शन बताता है कि शहरी और ग्रामीण—दोनों केरल में यूडीएफ को व्यापक समर्थन मिला है।
इस चुनाव में सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि एलडीएफ को भी जनता ने सख्ती से नकारा। एलडीएफ को 239 ग्राम पंचायतों, 48 ब्लॉक पंचायतों, 14 नगरपालिकाओं और 4 जिला पंचायतों का नुकसान हुआ। कॉरपोरेशनों में भी उसकी संख्या 5 से घटकर 1 रह गई। शहर हों या गांव, केरल की जनता ने एक स्वर में एलडीएफ सरकार के प्रदर्शन के खिलाफ मतदान किया।
यहां तक कि तिरुवनंतपुरम में, जहां एनडीए एक कॉरपोरेशन को “ब्रेकथ्रू” बताने की कोशिश कर रहा है, वहां भी कॉरपोरेशन से बाहर की पूरी तस्वीर उसके दावों की पोल खोल देती है। तिरुवनंतपुरम जिले में एनडीए को 0 जिला पंचायत, 0 नगरपालिका, 0 ब्लॉक पंचायत और महज 6 ग्राम पंचायतें मिली हैं। यानी कॉरपोरेशन को छोड़ दें तो बाकी पूरे इलाके में उसका लगभग सफाया हो चुका है।
इन तमाम आंकड़ों के बाद भी अगर जीत का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की जा रही है, तो वह सिर्फ राजनीतिक प्रचार भर है। हकीकत बिल्कुल साफ है—यह चुनाव यूडीएफ की लहर का प्रमाण है। संदेश स्पष्ट है कि केरल की जनता ने बीजेपी और एलडीएफ दोनों को नकारते हुए कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ को भरोसेमंद विकल्प माना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यही रुझान बना रहा, तो 2026 के विधानसभा चुनाव में भी यही जनादेश और ज्यादा निर्णायक रूप में दोहराया जा सकता है।




