समी अहमद 13 दिसंबर 2025
बिहार के नवादा ज़िले से सामने आई यह घटना एक बार फिर देश को झकझोर देने वाली है, जहाँ रोज़ी-रोटी की तलाश में कपड़ा बेचने निकले एक साधारण आदमी को भीड़ ने उसकी पहचान के आधार पर मौत के घाट उतार दिया। नालंदा निवासी 40 वर्षीय मोहम्मद अतहर हुसैन को 5 दिसंबर को नवादा के एक गांव में कथित तौर पर रोका गया, पहले उसका नाम पूछा गया और फिर जबरन उसकी पैंट उतरवाकर धर्म की पहचान की गई। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार करने के लिए काफी है।
प्रत्यक्ष आरोपों और बाद में दिए गए पीड़ित के बयान के अनुसार, हमलावरों ने अतहर हुसैन के हाथ-पैर बांध दिए और लाठियों, रॉड, ईंटों और सरियों से बेरहमी से पिटाई की। उनकी उंगलियां प्लास से कुचली गईं, नाखून उखाड़े गए और शरीर को जलाने की भी कोशिश की गई। गंभीर रूप से घायल अवस्था में उन्हें बिहार शरीफ सदर अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्होंने मरने से पहले अपना बयान दर्ज कराया। इलाज के दौरान शुक्रवार देर रात उन्होंने दम तोड़ दिया। उनका यह बयान अब इस पूरे मामले में सबसे अहम सबूत माना जा रहा है।
पीड़ित की पत्नी शबनम परवीन ने थाने में दर्ज कराई गई FIR में 10 नामजद और 15 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया है। FIR में सोनू कुमार, रंजन कुमार, सचिन कुमार और श्री कुमार सहित कई नाम दर्ज हैं। पुलिस ने अब तक चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है। प्रशासन का दावा है कि मामले की जांच तेज़ी से की जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ गिरफ्तारी से ऐसी घटनाओं पर लगाम लगेगी?
मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस हत्या को साफ तौर पर पहचान आधारित हिंसा और मॉब लिंचिंग करार दिया है। टीम राइजिंग फाल्कन समेत कई संगठनों ने कहा है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि उस डरावनी सच्चाई का आईना है, जिसमें भारत के मुसलमानों को सिर्फ अपनी पहचान के कारण निशाना बनाया जा रहा है। बयान में कहा गया है कि आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि “सिर्फ मौजूद होना भी मौत की सज़ा बनता जा रहा है।”
यह घटना ऐसे समय पर सामने आई है जब देश में कानून-व्यवस्था, भीड़ हिंसा और नफरत के अपराधों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न आयोगों की सख्त टिप्पणियों के बावजूद, ज़मीनी हकीकत में बदलाव नज़र नहीं आ रहा। नवादा की यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा समाज वाकई संविधान के मूल्यों—बराबरी, भाईचारे और इंसानियत—पर खड़ा है, या फिर डर और नफरत धीरे-धीरे कानून से ऊपर होती जा रही है।
मोहम्मद अतहर हुसैन की मौत सिर्फ उनके परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। सवाल अब सिर्फ न्याय का नहीं, बल्कि उस माहौल का है, जिसमें ऐसी हिंसा पनप रही है। क्या दोषियों को सख्त सज़ा मिलेगी? क्या राज्य और समाज मिलकर इस नफरत को रोक पाएंगे? या फिर यह भी एक और मामला बनकर फाइलों में दब जाएगा—इन सवालों के जवाब अब भी बाकी हैं।




