Home » National » पुतिन की आर्थिक मजबूरी और अमेरिकी निशानेबाज़ी: भारत की चापलूसी क्यों कर रहे हैं रूसी राष्ट्रपति?

पुतिन की आर्थिक मजबूरी और अमेरिकी निशानेबाज़ी: भारत की चापलूसी क्यों कर रहे हैं रूसी राष्ट्रपति?

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

आलोक कुमार । नई दिल्ली, 5 दिसंबर 2025 

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का यह भारत दौरा जितना औपचारिक है, उससे कहीं अधिक राजनीतिक और आर्थिक संकेतों से भरा हुआ है। दिल्ली पहुंचते ही उन्होंने भारत की ताकत, मोदी की स्वायत्त नेतृत्व क्षमता और 77 साल पुराने भारत से तुलना न करने की बात कही। पहली नज़र में यह भारत की तारीफ और दोनों देशों की “पुरानी दोस्ती” का स्वाभाविक विस्तार लगता है, लेकिन जब भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था के बदलते समीकरणों को देखा जाए, तो तस्वीर साफ होती है—पुतिन भारत की चापलूसी कर रहे हैं, और यह चापलूसी रूस की गहरी आर्थिक और राजनीतिक मजबूरियों से प्रेरित है। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों की मार बढ़ती जा रही है, यूरोपीय बाज़ार लगभग बंद हो चुका है, और रूस को अपने ऊर्जा निर्यात के लिए भारत जैसे बड़े उपभोक्ता की सख्त जरूरत है। ऐसे में पुतिन का “मोदी पर कोई दबाव नहीं बना सकता” कहना, दरअसल भारत के लिए सम्मान से अधिक, अमेरिका के लिए एक रणनीतिक संदेश और रूस के लिए एक आर्थिक सुरक्षा कवच है।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की अर्थव्यवस्था पर जो चोट पड़ी, उसकी भरपाई का मुख्य साधन था—तेल की बिक्री। पहले रूस भारत की कुल तेल खपत का केवल 2.5% आपूर्ति करता था, लेकिन जब पश्चिम ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाया, भारत ने मूल्य लाभ उठाते हुए यह हिस्सा 35% तक बढ़ा दिया। रूस के लिए यह एक बड़ा राहत मार्ग था, क्योंकि इससे उसके बजट और मुद्रा प्रवाह को सहारा मिला। लेकिन जब डोनाल्ड ट्रंप दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने भारत पर दबाव बढ़ाया और भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाकर यह संदेश भेजा कि रूस से तेल खरीदना अमेरिका को राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं। पुतिन इसका जवाब चुपचाप नहीं दे सकते थे। इसलिए उन्होंने भारत की प्रशंसा को अपना हथियार बनाया और अमेरिका को उलाहना देने के अंदाज़ में कहा कि “अमेरिका खुद भी रूस से यूरेनियम खरीदता है, लेकिन भारत पर सवाल उठाता है”—एक स्पष्ट संकेत था कि अमेरिका के दोहरे मापदंडों को भारत समझे और रूस पर भरोसा न छोड़े।

लेकिन इस कूटनीतिक अभिनय का दूसरा पहलू भारत की भूमिका में छिपा है। नेहरू, शास्त्री, इंदिरा और यहां तक कि मनमोहन सिंह तक, भारत–रूस संबंध न केवल भावनात्मक थे, बल्कि रणनीतिक रूप से भी मज़बूत थे। सोवियत काल में रूस भारत का सबसे बड़ा सैन्य और सुरक्षा साझेदार था। लेकिन मोदी के नेतृत्व में भारतीय विदेश नीति ने एक बिल्कुल नई दिशा ली—जहाँ रूस के साथ दोस्ती तो बनी रही, लेकिन उसकी केंद्रीयता कम हो गई। भारत ने हथियारों के नए स्रोत खोजे, अमेरिका और फ्रांस के साथ रक्षा सौदे बढ़ाए, और ‘क्वाड’ जैसे प्लेटफॉर्मों के जरिए इंडो-पैसिफिक में पश्चिम के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत की। यह बदलाव रूस के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि वह भलीभांति जानता है कि भारत अब उसे पहले जैसा विशेषाधिकार प्राप्त साझेदार नहीं मानता। इसलिए आज पुतिन को भारत की अहमियत बार-बार रेखांकित करनी पड़ रही है—ताकि दोनों देशों के पुराने समीकरण नए राजनीतिक दबावों में टूट न जाएं।

दिल्ली में पुतिन और मोदी के बीच हो रही चर्चाएँ सिर्फ रक्षा सौदों तक सीमित नहीं रहने वालीं। रूस चाहता है कि भारत तेल की खरीद में कमी न करे, और रक्षा क्षेत्र में Su-57 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तथा S-500 एयर डिफेंस सिस्टम जैसे सौदों पर आगे बढ़े। लेकिन रूस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसकी सैन्य उद्योग क्षमता पश्चिमी प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध की वजह से गंभीर दबाव में है। मिसाइल सिस्टम, इंजन और अन्य स्पेयर पार्ट्स की डिलीवरी में देरी हो रही है। मोदी सरकार इस स्थिति को लेकर पहले से सतर्क है और रूस से स्पष्ट समयसीमा और गारंटी चाहती है। यही वह कारण है कि पुतिन को आज भारत के सामने एक ऐसे मित्र की तरह पेश होना पड़ रहा है जो आर्थिक साझेदारी, राजनीतिक सम्मान और रणनीतिक सहयोग तीनों को प्राथमिकता देता हो—क्योंकि रूस को इन सभी की आज पहले से कहीं ज़्यादा जरूरत है।

पुतिन का यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब अमेरिका–रूस–यूक्रेन त्रिकोण में नए समीकरण बन रहे हैं। अगर ट्रंप की मध्यस्थता सफल होती है और युद्ध किसी समाधान की दिशा में बढ़ता है, तो रूस के लिए भारत का महत्व और बढ़ जाएगा। क्योंकि युद्धोत्तर दौर में रूस को अपनी अर्थव्यवस्था को खड़ा करने के लिए एशियाई साझेदारों—खासतौर पर भारत—की जरूरत पड़ेगी। दूसरी तरफ भारत भी जानता है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच रूस ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य क्षमता और चीन के खतरे से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण संतुलन प्रदान करता है। इसलिए भारत अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” को बनाए रखते हुए, न पश्चिम के साथ पूरी तरह जाएगा और न रूस को छोड़ेगा। यही संतुलन पुतिन समझते हैं—और इसी वजह से दिल्ली आने से पहले और दिल्ली पहुंचने के बाद उनकी भाषा में असहज प्रशंसा और आर्थिक अनिवार्यता दोनों दिखाई देती हैं।

अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि पुतिन का बयान “भारत अब 77 साल पहले वाला हिंदुस्तान नहीं” जितना भारत के लिए शाबाशी है, उतना ही रूस की मजबूरी का इज़हार भी। आज की वास्तविकता में रूस भारत को खो नहीं सकता और भारत रूस पर निर्भर रहना नहीं चाहता—और इसी द्वंद्व के बीच पुतिन की चापलूसी, अमेरिका पर व्यंग्यात्मक हमले और मोदी की प्रशंसा, सभी एक बड़े भू-राजनीतिक खेल के हिस्से के रूप में सामने आते हैं।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments