एबीसी डेस्क 4 दिसंबर 2025
भारत आज एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ संकीर्ण राष्ट्रवाद की आँधी ने लोकतंत्र, संविधान और नागरिक चेतना की जड़ों को हिलाना शुरू कर दिया है। विडंबना यह है कि जो जवाहरलाल नेहरू अपनी अंतिम साँस तक सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ते रहे, आज उन्हीं के नाम का इस्तेमाल सबसे ज़्यादा नफ़रत फैलाने, समाज को बाँटने और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के लिए किया जा रहा है। यह केवल ऐतिहासिक मज़ाक नहीं, बल्कि राष्ट्र के बौद्धिक क्षरण की भयावह तस्वीर है, जहाँ सत्य को उलटकर पेश करने का तंत्र इतना मज़बूत हो चुका है कि लोगों को सच देखने और समझने ही नहीं दिया जा रहा।
नेहरू ने आज़ादी के केवल छह वर्ष बाद, 1953 में ही मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर सांप्रदायिक संगठनों के असली चरित्र, उनके खतरनाक एजेंडे और छद्म राष्ट्रवाद की राजनीति के प्रति स्पष्ट चेतावनी दे दी थी। उन्होंने साफ़ कहा था कि राष्ट्रवाद वह नहीं है जो साम्प्रदायिक संस्थान जनता को दिखा रहे हैं—यह एक छलावा है, जो एकता के नाम पर अलायंस तोड़ता है, समाज को विभाजित करता है और लोकतांत्रिक सोच की हत्या कर देता है। आज, 70 साल बाद, नेहरू की वही चेतावनी अब एक राष्ट्रीय संकट बनकर हमारे सामने खड़ी है।
लोकतंत्र, संविधान और नागरिक चेतना पर संघ और सरकार का संयुक्त प्रहार अब हर दिन और तीखा होता जा रहा है। संसद से लेकर सड़क तक, संस्थानों से लेकर नागरिक अधिकारों तक—हर मोर्चे पर सुनियोजित हमले हो रहे हैं। विपक्षी दलों को समझना होगा कि इस लड़ाई में केवल राजनीतिक रणनीति से जवाब नहीं मिलेगा; सबसे पहले नागरिक चेतना को बचाना होगा। चिंता की बात यह है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा इस चेतना से पहले ही वंचित हो चुका है और लगातार इसका क्षरण तेज़ी से हो रहा है।
RSS की विचारधारा और उसके प्रभाव पर तथ्यात्मक बातचीत आज भी बेहद सीमित है। जनता का बड़ा हिस्सा गोदी मीडिया के मोहपाश में फँसा हुआ है, जहाँ खबरें सत्य नहीं, मनोरंजन और नफ़रत के मसालों से सजाई जाती हैं। मीडिया का यह पतन केवल पत्रकारिता का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर ख़तरा है। जब जनता को ही वास्तविक खतरे नज़र न आएँ, तो फिर राष्ट्र किसी भी दिशा में धकेला जा सकता है—और ऐसा धकेला जा भी रहा है।
इसी बीच, RSS लोकतंत्र पर अपनी पकड़ को रोज़ाना और मजबूत कर रहा है—संगठनात्मक विस्तार, सरकारी तंत्र में पैठ, शिक्षा-संस्कृति पर प्रभाव और जनसंचार के क्षेत्र में दबदबा। यह एक गहरी, योजनाबद्ध प्रक्रिया है, जिसे रोकने के लिए अब केवल राजनीतिक दल पर्याप्त नहीं रह गए हैं। नागरिक समाज, बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन और जागरूक जनता—सभी को मिलकर एक विशाल जन-आंदोलन खड़ा करना होगा। यह समय एक “विराट गांधी मार्ग” की ओर लौटने का है—जहाँ सत्य, अहिंसा, प्रतिरोध और जनता की सामूहिक चेतना नए रूप में सामने आए।
भारत किस दिशा में जा रहा है, यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं; यह हमारी सभ्यता, सामाजिक संरचना और लोकतांत्रिक आत्मा का सवाल है। यदि नागरिक चेतना को पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो नेहरू की चेतावनी केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ न रहकर एक असफल राष्ट्र की दास्तान बन जाएगी।




