आलोक कुमार । नई दिल्ली 4 दिसंबर 2025
48 घंटे में तीन बड़े ‘नाम’ उड़नछू—सोशल मीडिया में तूफ़ान, टीवी चैनल में सन्नाटा
पिछले 48 घंटों में देश की सत्ता और मीडिया तंत्र से जुड़े तीन बड़े नाम—हीरेन जोशी (PMO OSD), हितेश जैन (लॉ कमीशन) और नवनीत सहगल (प्रसार भारती चेयरमैन)—एक के बाद एक या तो हट गए या अचानक इस्तीफ़ा दे बैठे। सोशल मीडिया में #MahadevBettingScam और #HirenJoshi जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि देश के बड़े टीवी चैनलों पर इस पूरे भूचाल पर लगभग शून्य कवरेज है। देश पूछ रहा है—आख़िर किस डर से भारतीय मीडिया इस बड़े विस्फोट पर चुप है?
हीरेन जोशी—PMO का सबसे ताकतवर मीडिया मैनेजर—अचानक हटाया गया, देश में सवालों की बाढ़
हीरेन जोशी, जिन्हें प्रधानमंत्री का “आँख और कान”, “सबसे भरोसेमंद OSD” और मीडिया-मैनेजमेंट का मुख्य रणनीतिकार माना जाता था, अचानक PMO से हटा दिए गए। सोशल मीडिया पर दावा है कि दुबई से संचालित महादेव बेटिंग ऐप की फ़ाइलों में जोशी का नाम आया, और ED–CBI की प्राथमिक जांच में मीडिया मैनेजमेंट और फंडिंग को लेकर कई गंभीर विसंगतियाँ मिलीं। विपक्ष का बड़ा सवाल यह है: “जिस व्यक्ति को PMO ने इतने लंबे समय तक देश की मीडिया का कंट्रोल दिया, क्या वही महादेव ऐप से जुड़ा था?” कई पोस्ट यह भी दावा कर रहे हैं कि जोशी देश छोड़कर भाग चुके हैं—हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
लॉ कमीशन सदस्य हितेश जैन का भी इस्तीफ़ा—क्या कड़ी एक ही है?
अक्टूबर में ही लॉ कमीशन के प्रभावशाली सदस्य हितेश जैन का पद छोड़ना भी अब संदिग्ध संवादों का हिस्सा बन गया है। विपक्ष का आरोप है कि लॉ कमीशन का उपयोग कई विवादास्पद कानूनों को आगे बढ़ाने और राजनीतिक लाभ पहुँचाने के लिए किया गया, और अब अचानक उनका हटना जोशी प्रकरण से जुड़ा हो सकता है। सरकार चुप है, लेकिन घटनाओं की टाइमिंग संदेह पैदा करती है—तीन बड़े पद एक ही कालखंड में खाली क्यों हो रहे हैं?
प्रसार भारती के चेयरमैन नवनीत सहगल का इस्तीफ़ा—क्या ‘सफाई अभियान’ शुरू हो चुका है?
2 दिसंबर को प्रसार भारती चेयरमैन नवनीत सहगल ने इस्तीफ़ा दे दिया। केंद्र ने तुरंत स्वीकार भी कर लिया। कोई कारण नहीं बताया गया। लेकिन ऑफ रिकॉर्ड सरकारी सूत्र कह रहे हैं कि इस्तीफ़ा “स्वैच्छिक नहीं” था। प्रसार भारती, जो दूरदर्शन और आकाशवाणी को नियंत्रित करता है, मीडिया सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा है। अब सवाल यह है— क्या सरकार अंदरूनी सफाई कर रही है? या बड़ी बिल्डिंग गिरने से पहले खंभे हटाए जा रहे हैं?
विपक्ष का आरोप—‘50,000 करोड़ के बेटिंग स्कैम का काला धन और मीडिया की चुप्पी’, PMO की भूमिका पर गंभीर सवाल
विपक्ष के नेताओं ने खुलकर आरोप लगाया है कि महादेव ऐप स्कैम, जिसमें करीब ₹50,000 करोड़ के काले धन का जिक्र है, उसमें कई प्रभावशाली लोगों की भूमिका की जांच ज़रूरी है। कांग्रेस नेताओं ने पूछा: क्या PMO का OSD बेटिंग माफिया से जुड़ा था? कितना पैसा भारतीय मीडिया में बहा?
भारत की सुरक्षा पर इसका क्या असर पड़ा? सुप्रिया श्रीनेट ने सीधे सवाल उठाया—“प्रधानमंत्री के बेहद करीबी रहे जोशी को अचानक क्यों हटाया गया? क्या लिपापोती चल रही है?” स्वाति चतुर्वेदी ने ट्वीट किया कि हीरेन जोशी—जो मोदी के “eyes and ears” माने जाते थे—देश में हैं या बाहर, यह भी कोई नहीं जानता।
रवीश कुमार का कड़ा सवाल—‘आप ने अपने लोगों को कैसे पकड़ा? और साफ़ कौन कर रहा है?’
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने इस घटनाक्रम को लेकर तीखी टिप्पणी की— उन्होंने पूछा कि सरकार अपने ही भरोसेमंद लोगों को क्यों हटाने पर मजबूर हो गई?
“जो व्यक्ति मीडिया, नैरेटिव और हर फ़ाइल का राजा था, उसे हटाया क्यों गया? क्या छापा पड़ा? क्या कोई सौदा हुआ? या यह बड़े तूफ़ान से पहले की शांति है?” उनकी टिप्पणी इस बात की ओर संकेत करती है कि मामला सिर्फ एक इस्तीफ़ा नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में बड़े स्तर पर चल रही सफाई या संघर्ष का संकेत है।
क्या महादेव ऐप स्कैम ने सत्ता तंत्र की अंदरूनी परतें उधेड़ दी हैं?
महादेव बेटिंग ऐप की फाइलों में बड़े नेताओं, अधिकारियों और मीडिया मैनेजरों के नाम आने की चर्चा ने राजनीतिक माहौल को विष्फोटक बना दिया है। अगर PMO के सबसे ताकतवर अधिकारी तक पर शक है, तो सवाल और भी गंभीर हो जाता है—क्या यह सिर्फ भ्रष्टाचार का मामला है या राष्ट्रीय सुरक्षा का भी? सरकार अब तक चुप है, लेकिन घटनाओं की यह टाइमिंग बताती है कि अंदर कुछ बहुत बड़ा हिल चुका है।
कुछ तो गड़बड़ है PMO के भीतर”, लेकिन जवाब कोई नहीं दे रहा
एक साथ तीन इस्तीफ़े, बेटिंग ऐप से जुड़े कथित दस्तावेज़, मीडिया की चुप्पी, और PMO के भीतर हलचल—यह सब किसी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं लगता।
विपक्ष एक ही मांग कर रहा है: “CBI जांच हो, और देश को बताया जाए कि सच क्या है।” लेकिन टीवी चैनल शांत हैं, सरकार मौन है, और आम नागरिक सवालों के साथ खड़ा है— क्या देश को हक़ है कि वह जान सके कि सत्ता के भीतर क्या चल रहा है? या लोकतंत्र भी ‘प्राइवेट मोड’ पर डाल दिया गया है?




