सूफियान बिन फरहान । नई दिल्ली 4 दिसंबर 2025
भारतीय गेंदबाज़ी की विफलता—350+ स्कोर भी सुरक्षित नहीं
टेस्ट मैचों की लगातार शर्मनाक हार के बाद उम्मीद थी कि एकदिवसीय श्रृंखला में भारतीय टीम वापसी करेगी। बल्लेबाज़ों ने जिम्मेदारी निभाई भी—पहले ODI में 349 और दूसरे ODI में 359 का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया। लेकिन गेंदबाज़ी ने इन प्रयासों को मिट्टी में मिला दिया। पहला मैच भारतीय गेंदबाज़ जैसे-तैसे गिरते-पड़ते जीत गए, लेकिन दूसरे मैच में 360 जैसा मैच-विनिंग स्कोर भी भारतीय गेंदबाज़ी बचा नहीं पाई। आख़िरी ओवरों में तो ऐसा लगने लगा मानो टीम ने जीत की उम्मीद ही छोड़ दी हो—क्योंकि न तो कोई गेंदबाज़ विकेट निकाल पा रहा था और न ही रन रोक पा रहा था। यह टीम इंडिया की गेंदबाज़ी की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर करता है—टीम में एक भी ऐसा गेंदबाज़ मौजूद नहीं था जिस पर कप्तान संकट की घड़ी में भरोसा कर सके। ऐसी स्थिति किसी साधारण टीम की नहीं, बल्कि एक ऐसे क्रिकेट राष्ट्र की है जो खुद को विश्व क्रिकेट का दिग्गज बताता है।
चयनकर्ताओं की अयोग्यता—बेहतरीन गेंदबाज़ बाहर, औसत अंदर
जसप्रीत बुमराह और हार्दिक पांड्या का इंजरी के कारण बाहर होना परिस्थितियों का हिस्सा है, लेकिन टीम मैनेजमेंट की असली नीयत तब सामने आती है जब पूरी तरह फिट और विश्वस्तरीय गेंदबाज़—मोहम्मद शमी, मोहम्मद सिराज और युजवेंद्र चहल—को लगातार नजरअंदाज़ किया जाता है। शमी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट दोनों में लगातार विकेट झटक रहे हैं, सिराज पावरप्ले में दुनिया के सबसे घातक गेंदबाज़ों में शामिल हैं, और चहल सफेद गेंद क्रिकेट में भारत के सबसे अनुभवी स्पिनर हैं—फिर भी ये तीनों टीम से बाहर बैठे हैं। दूसरी तरफ, औसत प्रदर्शन वाले दोयम दर्जे के गेंदबाज़ टीम में स्थायी हैं। इससे भी बड़ी अनदेखी है जम्मू–कश्मीर का उभरता तेज़ गेंदबाज़ आकिब नबी, जिसने डोमेस्टिक क्रिकेट में चार गेंदों में चार विकेट लेकर इतिहास रच दिया—फिर भी चयनकर्ताओं की नज़र उस पर नहीं जाती। भारतीय क्रिकेट आज एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहाँ फैंस का भरोसा टूट रहा है और चयन प्रणाली पूरी तरह सवालों के घेरे में है। लोगों का साफ कहना है कि BCCI की चयन नीति ‘कोमा’ में पहुँच चुकी है—योग्यता, आँकड़े, मेहनत और फॉर्म अब मायने नहीं रखते। राजनीति, चहेता-वाद और व्यक्तिगत अहंकार ही नए चयन मानक बन गए हैं। यही वजह है कि आज हर भारतीय प्रशंसक दर्द भरे स्वर में यही सवाल पूछ रहा है—“अच्छे खिलाड़ी जाएँ तो जाएँ कहाँ?”
अजित आगरकर की चयन समिति—दिशाहीन नीतियाँ और लगातार बदतर फैसला-प्रक्रिया
चयन समिति के अध्यक्ष अजित आगरकर आज भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी बन चुके हैं। उनके नेतृत्व में चयन समिति ऐसे फैसले ले रही है जो न सिर्फ क्रिकेटिक तर्कों के खिलाफ हैं, बल्कि टीम इंडिया के भविष्य को भी खतरे में डाल रहे हैं। सबसे बड़ा उदाहरण है प्रसिद्ध कृष्णा का चयन, जबकि उनका अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन और सांख्यिकी दोनों ही यह साबित करते हैं कि वे फिलहाल टीम इंडिया के स्तर से काफी नीचे हैं।
टेस्ट में उनका असर लगभग नगण्य है, एकदिवसीय क्रिकेट में उनका इकॉनमी और नियंत्रण दोनों खराब हैं और टी20 में उनका औसत 11 रन प्रति ओवर तक पहुँच जाता है, जो खतरनाक रूप से कमजोर प्रदर्शन को दर्शाता है। इसके बावजूद वे टीम में हैं, क्योंकि चयन समिति के पास कोई स्पष्ट मानक नहीं बचा है। वहीं हर्षित राणा, जिनकी गेंदबाज़ी में अंतरराष्ट्रीय मजबूती की कमी है, उन्हें भविष्य का सितारा बताकर टीम में डाला जा रहा है। यह चयन नहीं, बल्कि अयोग्यता की खुली प्रदर्शनी है।
गौतम गंभीर का घमंडी रवैया—ड्रेसिंग रूम में मनमर्जी और योग्यता का दमन
भारतीय टीम के कोच गौतम गंभीर को उम्मीद थी कि वे एकजुटता, अनुशासन और आक्रामक मानसिकता लेकर आएँगे। परंतु उनका व्यवहार उल्टा टीम को बाँट रहा है, ड्रेसिंग रूम का माहौल बिगाड़ रहा है और चयन प्रक्रिया को ‘व्यक्तिगत पसंद-नापसंद’ की ओर धकेल रहा है। सबसे स्पष्ट उदाहरण है सरफराज खान का। 67 की शानदार औसत के साथ लगातार रन बनाने के बावजूद उन्हें टेस्ट टीम में जगह नहीं दी जा रही। गंभीर का आरोप—“ड्रेसिंग रूम की बातें बाहर जाता है।” क्या यह पेशेवर क्रिकेट है या व्यक्तिगत अदालत? क्या इतने प्रतिभाशाली खिलाड़ी को सिर्फ इसलिए बाहर रखा जाएगा कि कोच का उनसे मनमुटाव है? यदि कोच का घमंड चयन प्रक्रिया से बड़ा हो जाए, तो टीम की रीढ़ स्वतः टूट जाती है—और यही भारतीय क्रिकेट के साथ हो रहा है।
अच्छे गेंदबाज़ बाहर और औसत गेंदबाज़ अंदर—भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी त्रासदी
भारतीय टीम के पास दुनिया के दो सबसे बेहतरीन तेज गेंदबाज़ हैं—मोहम्मद शमी और मोहम्मद सिराज। सिराज पावरप्ले में दुनिया के सबसे घातक गेंदबाज़ों में गिने जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा अपराध यह है कि शमी, जो लगातार भारतीय क्रिकेट को मैच विजेता क्षण देते आए हैं, उन्हें जानबूझकर बाहर रखा जा रहा है। जबकि दूसरी तरफ प्रसिद्ध कृष्णा, हर्षित राणा जैसे गेंदबाज़ों को ना सिर्फ टीम में जगह मिल रही है, बल्कि उन पर भरोसा भी जताया जा रहा है। यह चयन कम, और भारतीय क्रिकेटिंग न्याय का मजाक ज्यादा है। अक्षर पटेल जैसी स्थिर और प्रभावी ऑल-राउंड प्रतिभा को बाहर रखकर वाशिंगटन सुंदर पर भरोसा जताना चयनकर्ताओं की तकनीकी कमजोरी का प्रमाण है। बैकअप के तौर पर युजवेंद्र चहल को न लेना एक और गलत निर्णय है, जिससे टीम के स्पिन विभाग की रीढ़ कमज़ोर होती जा रही है।
मोहम्मद शमी—सर्वश्रेष्ठ पेसर को ‘जानबूझकर अनदेखा’ करने की शर्मनाक नीति
शमी आज जिस स्तर के गेंदबाज़ हैं, ऐसा भारत बहुत कम पैदा करता है। घरेलू क्रिकेट में वे लगातार विकेट झटक रहे हैं। फिटनेस और रफ्तार दोनों बेहतरीन हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका रिकॉर्ड किसी भी शीर्ष गेंदबाज़ को मात देने वाला है। 2023 विश्वकप में उन्होंने अकेले दम पर भारत को फाइनल के दरवाज़े तक पहुँचाया—सबसे ज्यादा विकेट, सबसे घातक स्पेल, और मैच दर मैच विपक्ष को तोड़ देने वाली गेंदबाज़ी।
शमी वह गेंदबाज़ हैं जिन्हें मौका मिला है तो उन्होंने भारत को जीत के करीब पहुँचाया है—हर बार, हर फॉर्मेट में। लेकिन चयनकर्ताओं और गंभीर को लगता है—“शमी बाहर रहेंगे तो ही टीम मजबूत होगी।” मानो किसी खिलाड़ी से व्यक्तिगत समस्या टीम की रणनीति से ऊपर हो गई हो।
यह सिर्फ शर्मनाक नहीं—भारतीय क्रिकेट का सार्वजनिक अपमान है।
कश्मीर का उभरता सितारा—आकिब नबी की ऐतिहासिक उपलब्धि को भी नज़रअंदाज़ किया जा रहा है
जम्मू–कश्मीर के तेज गेंदबाज़ आकिब नबी आज भारत की सबसे चमकदार गेंदबाजी प्रतिभाओं में से एक हैं। Duleep Trophy में उन्होंने भारतीय घरेलू इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार किया— चार गेंदों में चार विकेट, 150+ की रफ्तार, स्विंग और सीम पोजीशन पर ज़बरदस्त नियंत्रण, विपक्षी बल्लेबाज़ों की रीढ़ तोड़ देने वाला स्पेल। Wisden ने इसे घरेलू क्रिकेट का ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताया। लेकिन चयनकर्ताओं की नज़र उनके ऊपर है ही नहीं। क्यों? क्योंकि आकिब नबी किसी “चहेते ग्रुप” में शामिल नहीं हैं। भारत के पास एक ऐसा गेंदबाज़ तैयार खड़ा है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धमाका कर सकता है—लेकिन चयन समिति उसकी प्रतिभा को धूल खाने दे रही है।
स्पिन विभाग में दुर्बलता—अक्षर बाहर, चहल गायब, और टीम का भविष्य खतरे में
स्पिन विभाग में भी वही अनुचित राजनीति चल रही है। अक्षर पटेल, जो लगातार प्रभावी रहे हैं, हर मैच में योगदान देते हैं और तीनों फॉर्मेट में संतुलन प्रदान कर सकते हैं—उन्हें नजरअंदाज़ किया गया है। युजवेंद्र चहल जैसे अनुभवी और मैच-विनर स्पिनर को वर्षों से टीम से बाहर रखा गया है, मानो सफेद गेंद क्रिकेट में उनकी कोई जगह ही नहीं।
स्पिन विभाग भारतीय क्रिकेट की पहचान रहा है—लेकिन आज वह विभाग चयन समिति की गलत नीतियों का सीधा शिकार बन गया है।
भारतीय क्रिकेट का पतन जारी है, और इसका पूरा दोष BCCI पर है
जब— अच्छे तेज गेंदबाज़ शमी और सिराज बाहर हों, स्पिन के अनुभवी योद्धा चहल बाहर हों, ऑलराउंड स्थिरता देने वाले अक्षर बाहर हों, घमंडी कोच गंभीर अपनी मनमर्जी थोपें और कमजोर चयन समिति औसत खिलाड़ियों को टीम में भरे— तो भारतीय क्रिकेट का पतन रुक नहीं सकता। आज सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या टीम इंडिया अब योग्यता पर चुनी जाएगी या कुछ लोगों के अहंकार पर?




