महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 4 दिसंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल—“महिला संकट में जाएँ तो जाएँ कहाँ?”
दिल्ली महिला आयोग (DCW) की शर्मनाक हालत पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई और पूछा कि “महिलाएँ संकट में जाएँ तो जाएँ कहाँ?” न्यायमूर्ति JB Pardiwala और KV Viswanathan ने साफ कहा कि DCW बिना चेयरपर्सन, बिना स्टाफ और बिना संचालन के पूरी तरह बंद पड़ा है। अदालत ने इसे दिल्ली प्रशासन की सीधी नाकामी बताया और कहा कि यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक राजधानी के लिए शर्मनाक है। महिलाएँ—जो अत्याचार, हिंसा, दहेज प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न या किसी भी आपात स्थिति में आयोग पर निर्भर रहती हैं—अब अपने ही शहर में असहाय छोड़ दी गई हैं।
DCW का ध्वस्त ढांचा—चेयरपर्सन 2 साल से नहीं, कर्मचारी 200 हटाए
DCW की हालत किसी मृत संस्था जैसी हो चुकी है। स्वाति मालीवाल के जनवरी 2024 में राज्यसभा जाने के बाद से आयोग की बागडोर किसके हाथ में है—किसी को नहीं पता। मई 2024 में दिल्ली सरकार ने 200 से अधिक संविदा कर्मचारियों को हटा दिया, जिससे आयोग का पूरा ढांचा ही ढह गया। वेबसाइट पर चेयरपर्सन, सदस्य सचिव और सभी सदस्य रिक्त दिखते हैं। महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर बनी सबसे महत्वपूर्ण संस्था को जानबूझकर ‘लॉकडाउन मोड’ में पहुँचाकर छोड़ दिया गया है।
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग 3 साल से खाली—अल्पसंख्यक न्याय व्यवस्था ठप
DCW की तरह दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग भी लगभग तीन साल से बिना चेयरमैन और बिना सदस्यों के पड़ा हुआ है। मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय से जुड़े हजारों पेंडिंग मामलों पर कोई सुनवाई नहीं हो रही। नस्लीय भेदभाव, धार्मिक उत्पीड़न, स्कूल-कार्यालयों में भेदभाव, अल्पसंख्यक स्कॉलरशिप, धार्मिक स्थलों के विवाद—हर केस सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ चुका है। राजधानी का अल्पसंख्यक आयोग बंद होना सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं—यह संवैधानिक उदासीनता और राजनीतिक असंवेदनशीलता का सबूत है।
केंद्र में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग भी खाली—हजारों फाइलें धूल खा रहीं
केंद्र सरकार की स्थिति भी दिल्ली से बेहतर नहीं। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) कई महीनों से बिना चेयरमैन और बिना सदस्यों के पड़ा हुआ है। जिस संस्था को पूरे देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, अधिकार और कानूनी संरक्षण सुनिश्चित करना था, वहीं खुद ICU में पड़ी है। धार्मिक भेदभाव, शिक्षा अधिकार, अल्पसंख्यक संस्थानों को मान्यता, हिंसा के मामलों की जांच—सभी फाइलें महीनों से बिना हस्ताक्षर धूल खा रही हैं। यह सरकार की उस सोच को उजागर करता है जहाँ संवैधानिक निकायों को प्राथमिकता नहीं—बल्कि परेशानी समझा जाता है।
NCMEI भी एक ही बंदे के भरोसे—और अब ताला लगने की कगार पर
अल्पसंख्यक शिक्षा की बुनियादी संस्था National Commission for Minority Educational Institutions (NCMEI) की स्थिति तो और भयावह है। पिछले तीन साल से यह पूरा आयोग सिर्फ एक ही व्यक्ति के भरोसे चल रहा है—Acting Chairman। कोई सदस्य नहीं, कोई बोर्ड नहीं, कोई पूर्ण आयोग संरचना नहीं। और अब जबकि कार्यवाहक चेयरमैन का कार्यकाल समाप्त होने वाला है, NCMEI पर भी ताला लगने की नौबत आ चुकी है। देशभर के अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों—स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों—के सैकड़ों विवाद, मान्यता से लेकर अधिकारों तक की कानूनी प्रक्रियाएँ अधर में लटक जाएँगी। यह स्थिति बताती है कि बच्चों की शिक्षा, अल्पसंख्यक अधिकार और संवैधानिक संस्थाएँ सरकार की सूची में सबसे नीचे हैं।
बच्चे भी भगवान भरोसे—चाइल्ड वेलफेयर ऑफिस भी खाली, कोई सुनवाई नहीं
महिलाओं और अल्पसंख्यकों की संस्थाओं की तरह ही चाइल्ड वेलफेयर कमेटियों और चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसों में भी भारी रिक्तियाँ हैं। कई जिलों में तो पूरे कार्यालय महीनों से खाली पड़े हैं। बाल तस्करी, दत्तक ग्रहण, बाल सुरक्षा, परित्यक्त बच्चों की पुनर्वास प्रक्रिया—सब पर असर पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट लगातार निर्देश दे रहा है, लेकिन सरकार की उदासीनता से स्पष्ट है कि बच्चे सरकार की प्राथमिकता में कहीं नहीं हैं। जब बच्चों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों—तीनों के लिए बने संवैधानिक ढांचे ही टूट जाएँ, तो यह सिर्फ संवैधानिक संकट नहीं, बल्कि मानवीय संकट है।
संस्थाएँ सांसें गिन रही हैं, सरकार गहरी नींद में
DCW बंद। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग बंद। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग खाली। NCMEI ताला लगाने की तैयारी में। चाइल्ड वेलफेयर सिस्टम आधा ध्वस्त।
यह कोई सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं—यह एक ऐसे शासन का चेहरा है जहाँ संवैधानिक संस्थाएँ ‘असहज बोझ’ बन चुकी हैं। सरकार कान में तेल डालकर सो रही है, और जनता—महिलाएँ, बच्चे, अल्पसंख्यक—न्याय के लिए दर-दर भटक रही है। देश आज यह कड़वा सवाल पूछ रहा है:
“अगर आयोग ही बंद हैं, तो लोकतंत्र किसके सहारे चल रहा है?”




