सुनील कुमार । नई दिल्ली | 3 दिसंबर 2025
भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है जहां आंकड़ों की चमक नहीं, ज़मीनी सच्चाई सबसे ज़ोर से बोल रही है—और यह सच्चाई न सिर्फ चुभने वाली है बल्कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को कठघरे में खड़ा करती है। वह नरेंद्र मोदी जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए मनमोहन सिंह सरकार को रुपये की मामूली गिरावट पर दिन-रात कोसा, सोशल मीडिया से लेकर चुनावी जनसभाओं तक मज़ाक उड़ाया, आज अपने 11 साल के शासन के बाद उसी रुपये को ऐतिहासिक गिरावट की कगार पर पहुंचा चुके हैं। तब डॉलर के मुकाबले रुपया 60 के आसपास था और मोदी इसे “राष्ट्रीय शर्म” बताते थे। लेकिन आज वही रुपया मोदी के नेतृत्व में 90 के पार पहुंच चुका है—और विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री की आवाज़ तक नहीं निकल रही।
न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न स्पष्टीकरण, न कोई ठोस योजना—देश सिर्फ मौन शासन देख रहा है।
सवाल ये नहीं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर है; सवाल यह है कि भारत अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से अधिक चोटिल क्यों हुआ? क्यों हमारा रुपया डॉलर और पौंड—दोनों के मुकाबले—इतिहास में सबसे कमजोर स्तर पर है? अगर अर्थव्यवस्था “सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई” होती, तो क्या उसकी मुद्रा इस तरह ढहती? विदेशी निवेशकों का तेज़ी से पलायन, शेयर बाज़ार में उथल-पुथल, फंड हाउसों का एक्सपोज़र कम करना—यह सब बताता है कि भारत में confidence crisis बढ़ रहा है।
सरकार इसे सिर्फ “वैश्विक परिस्थिति” कहकर टालना चाहती है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गंभीर है। अमेरिका और ब्रिटेन में ऊंची ब्याज दरें जरूर निवेश का रुख बदल रही हैं, पर भारत पर इसका प्रभाव disproportionate क्यों है? इसका उत्तर भीतर की कमजोरियों में छिपा है—नीतिगत भ्रम, अनिश्चितता, नौकरशाही की अत्यधिक दखलंदाजी, बेमायने टैक्स दबाव, और बेरोज़गारी के बढ़ते संकट ने मिलकर निवेशकों का भरोसा तोड़ा है।
रुपये की गिरावट का सबसे बड़ा दंश आम जनता झेलेगी। कच्चे तेल का आयात महंगा होने से पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे परिवहन महंगा होगा और महंगाई हर घर तक पहुंचेगी। इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयाँ, मोबाइल फोन, उर्वरक, औद्योगिक मशीनरी—सबकी कीमतों पर आग लगने ही वाली है। यह सिर्फ आर्थिक आंकड़े नहीं, जनता की जेब पर सीधा हमला है।
सरकार दावा कर रही है कि “भारत की बुनियादी अर्थव्यवस्था मजबूत है”—लेकिन फिर सवाल उठता है कि मजबूत अर्थव्यवस्था की मुद्रा इतनी कमजोर कैसे? क्यों MSME सेक्टर टूट गया? क्यों स्टार्टअप्स पलायन कर रहे हैं? क्यों विनिर्माण उत्पादन सुस्त पड़ गया? क्यों कृषि क्षेत्र में संकट लगातार गहराता जा रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्यों रोजगार का संकट ऐतिहासिक स्तर पर है?
विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार आर्थिक प्रबंधन नहीं, प्रचार प्रबंधन चला रही है। और जब आर्थिक हकीकत सामने आई है, तब सरकार की चुप्पी बताती है कि न रोडमैप है, न तैयारी, न पारदर्शिता।
रुपये की शर्मनाक गिरावट ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है—क्या भारत उस दिशा में बढ़ रहा है जहां आर्थिक प्रणाली सिर्फ दिखावे और भाषणों पर चल रही है? क्या वही सरकार जो 2014 में “60 रुपये का डॉलर” देखकर हंगामा मचाती थी, आज “90 रुपये के डॉलर” पर देश को भरोसे में लेने की हिम्मत खो चुकी है?
आने वाले सप्ताह बेहद संवेदनशील हैं। अगर मुद्रा इसी तरह कमजोर होती रही तो भारत को महंगाई, निवेश संकट, वित्तीय अस्थिरता और बेरोज़गारी की ऐसी संयुक्त मार झेलनी पड़ेगी जिसे रोकना बेहद कठिन होगा। और इसलिए आज देश का सबसे बड़ा सवाल यही है— जो लोग 2014 में 60 रुपये पर चिल्ला रहे थे, वे आज 90 रुपये पर खामोश क्यों हैं?




