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SIR की आग में झुलसेगा सत्र—विपक्ष-सरकार आमने-सामने

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आलोक कुमार । नई दिल्ली 30 नवंबर 2025

संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ही देश की राजनीति एक नए विस्फोटक मोड़ पर पहुंच गई है। Special Intensive Revision (SIR) के मुद्दे ने ऐसा माहौल बना दिया है कि पूरा सत्र हंगामे, आरोपों, शोर-शराबे और टकराव की आग में झुलसने वाला है। विपक्ष साफ शब्दों में कह रहा है कि यह SIR कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर की सरकारी स्कीम है, जिसका लक्ष्य वोटों के समीकरण बदलना और लोकतंत्र की जड़ों तक पहुंचना है। शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ही विपक्षी दलों ने एक झंडे के नीचे आने की योजना बना ली है, जो अपने-आप में इस बात की गंभीर चेतावनी है कि संसद का माहौल इस बार शांत रहने वाला नहीं है।

सरकार ने आनन-फानन में सभी पार्टियों की बैठक बुलाई है, जिसका उद्देश्य विपक्ष का गुस्सा शांत करना दिखाया जा रहा है, लेकिन विपक्ष इसे केवल एक औपचारिकता और राजनीतिक दिखावा बता रहा है। सरकार पर आरोप है कि वह SIR के नाम पर ऐसी कार्रवाई कर रही है जिससे लाखों नागरिकों के वोटर कार्ड रद्द हो सकते हैं, और इसका सीधा असर चुनावी परिणामों पर होगा। विपक्ष यह भी कह रहा है कि सरकार लोकतांत्रिक ढांचे को निजी राजनीतिक फायदे के लिए मोड़ने की तैयारी कर चुकी है। SIR प्रक्रिया को ‘कानूनी’ और ‘पूर्व-नजीर’ बताकर बचाव करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन विपक्ष इसे साफ तौर पर लोकतांत्रिक हमला कह रहा है।

दूसरी ओर, विपक्ष के भीतर भी जो असंतोष और बिखराव पिछले महीनों में नजर आ रहा था, SIR ने उसे अचानक समाप्त कर दिया है। बिहार हार के बाद बिखरी विपक्षी राजनीति को यह मुद्दा एक ऐसा सामूहिक हथियार दे चुका है, जिससे वे एक बार फिर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश में आक्रामक हो गए हैं। कई ऐसे दल जो अब तक आपसी तालमेल में कमजोर दिखते थे, SIR के मुद्दे पर एक झंडे के नीचे खड़े हो गए हैं और संसद में सरकार को कठघरे में खड़ा करने की तैयारी कर चुके हैं। यह एक बड़ा संकेत है कि इस बार शीतकालीन सत्र केवल राजनीतिक बहस का मंच नहीं रहेगा, बल्कि एक तरफ सरकार और दूसरी तरफ लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का दावा करने वाला विपक्ष आमने-सामने भिड़ने वाला है।

लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही इस बार शांतिपूर्ण तरीके से चल पाएं, ऐसा लगता नहीं। विपक्ष पहले ही घोषणा कर चुका है कि वह सदन के वेल में उतरकर सरकार से जवाब मांगेगा। उनके अनुसार SIR “टेक्निकल एक्सरसाइज” नहीं बल्कि ऐसा ऑपरेशन है जिसका परिणाम देश की मतदाता संरचना को बदलने, कमजोर वर्गों के मतदाताओं को सूची से हटाने और भविष्य के चुनावों को प्रभावित करने के रूप में देखने को मिलेगा। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे सीधे शब्दों में कहा है—“ये वोटर राइट्स पर सीधा हमला है”।

सरकार का कहना है कि वह चुनाव आयोग और कानून की सीमाओं के भीतर काम कर रही है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग खुद पहले से राजनीतिक दबाव में है, और SIR के माध्यम से सरकार एक बड़े पैमाने पर बदलाव की तैयारी कर चुकी है। इस टकराव ने शीतकालीन सत्र को एक ऐसी ज्वालामुखी पर खड़ा कर दिया है, जो किसी भी क्षण फट सकती है। जिस प्रकार पहले ही विरोध प्रदर्शन, प्रेस कॉन्फ्रेंस और रणनीति बैठकें विपक्ष की तरफ से की जा रही हैं, यह स्पष्ट है कि SIR इस सत्र का मुख्य युद्धक्षेत्र बनने वाला है।

अंततः सवाल यही है कि क्या इस बार संसद वाकई कानून बनाने का केंद्र बनेगी, या एक बार फिर सत्ता और विपक्ष के बीच की जंग, बहिष्कार, नारेबाजी, स्थगन और टकराव के बीच बिखर जाएगी। जो भी हो, इतना तय है कि SIR की आंधी ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यह सत्र सिर्फ एक मुद्दे की बहस नहीं—यह लोकतंत्र के दायरे, चुनावों की पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की एक निर्णायक लड़ाई बनने जा रहा है। भारत की संसद अब एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक गलत कदम आने वाले दशक की राजनीतिक दिशा तय कर सकता है।

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