सुधांशु शेखर | बेंगलुरु, 26 नवंबर 2025
कर्नाटक की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के भीतर महीनों से उभरता सत्ता-साझेदारी का विवाद अब इस हद तक गंभीर हो गया है कि पार्टी हाई कमांड को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच पनप रही राजनीतिक खींचतान कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। इसी पृष्ठभूमि में पार्टी नेतृत्व ने दोनों नेताओं को दिल्ली तलब करने का फैसला किया है, ताकि विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जा सके। कांग्रेस के अनुसार, संसद के शीतकालीन सत्र से पहले इस तनाव को खत्म करना बेहद आवश्यक है, क्योंकि यह न केवल सरकार की स्थिरता बल्कि पार्टी की राष्ट्रीय छवि पर भी प्रभाव डाल रहा है।
कर्नाटक कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी 28 या 29 नवंबर को दोनों नेताओं से क्रमशः और संयुक्त रूप से बातचीत करेंगे। हाई कमांड का मानना है कि विवाद अब मीडिया और राजनीतिक मंचों पर बहुत ज़्यादा सामने आ चुका है, जिससे नुकसान नियंत्रण (डैमेज कंट्रोल) की तत्काल जरूरत है। बीजेपी लगातार इस स्थिति को कांग्रेस की “अंदरूनी अस्थिरता” के रूप में प्रचारित कर रही है और यह दावा कर रही है कि कर्नाटक की सरकार अपनी ऊर्जा जनता के मुद्दों पर नहीं, बल्कि आपसी मनमुटाव पर खर्च कर रही है। यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व इस विवाद का शीघ्र समाधान चाहता है, ताकि राज्य की राजनीतिक दिशा नियंत्रण में रखी जा सके।
सत्ता-साझेदारी की यह लड़ाई उस अनौपचारिक सहमति से जुड़ी है जिसमें माना जाता है कि सरकार के कार्यकाल के मध्य में मुख्यमंत्री पद का परिवर्तन किया जाना था। हालांकि सिद्धारमैया के समर्थकों का कहना है कि वह पूरा कार्यकाल निभाने के लिए चुने गए हैं, जबकि डी.के. शिवकुमार के समर्थक “पावर शिफ्ट” के वादे को तत्काल लागू करने की मांग कर रहे हैं। इस खींचतान का असर प्रशासन, मंत्रिमंडल विस्तार और पार्टी की आंतरिक एकजुटता पर भी साफ दिख रहा है। वरिष्ठ नेताओं द्वारा हाल के दिनों में दिए गए बयान—जैसे “कांग्रेस टीम प्रयास से सत्ता में आई है”—भी इसी उथल-पुथल का संकेत देते हैं।
कर्नाटक कांग्रेस में उभर चुके इन दो मजबूत खेमों ने नेतृत्व के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार की स्थिरता अब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि हाई कमांड इस विवाद को कितनी दृढ़ता और तेजी से सुलझा पाता है। यदि दिल्ली में होने वाली बातचीत किसी स्पष्ट और संतुलित फॉर्मूले पर समाप्त होती है तो सरकार राहत की सांस ले सकती है। लेकिन अगर समाधान नहीं निकलता, तो कांग्रेस के भीतर उबाल और तेज हो सकता है और इसका सीधा असर राज्य की प्रशासनिक कार्यक्षमता और 2026 के लोकसभा चुनावों पर पड़ सकता है।
उधर, बीजेपी इस स्थिति को अपने राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने में कोई कमी नहीं छोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस सरकार अपनी आंतरिक लड़ाई में इस कदर उलझी हुई है कि किसानों, युवाओं और आम नागरिकों के मुद्दे पीछे छूट गए हैं। बीजेपी नेताओं का आरोप है कि “कर्नाटक की सरकार कुर्सी बचाने में व्यस्त है, जनता की समस्याएँ किसे दिखती हैं?” कांग्रेस का जमीनी कैडर भी इस लगातार चल रहे विवाद से असहज है और पार्टी के भीतर यह चिंता बढ़ रही है कि यदि समय रहते स्थिति को संभाला नहीं गया, तो इसका नुकसान निचले स्तर तक पहुँचेगा।
दिल्ली में होने वाली आगामी बैठक कर्नाटक की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। कांग्रेस हाई कमांड के सामने चुनौती केवल विवाद सुलझाने की नहीं, बल्कि राज्य सरकार को स्थिर और प्रभावी बनाए रखने की भी है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार मजबूती से टिकी रहेगी या सत्ता-संघर्ष उसे और अस्थिरता की ओर धकेलेगा।




