महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 26 नवंबर 2025
भारत के वित्तीय तंत्र को हिला देने वाले 1.6 बिलियन डॉलर के विशाल बैंक धोखाधड़ी मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के एक अहम निर्णय ने एक बार फिर सत्ता-नज़दीकी और आर्थिक अपराधों की जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अरबपति कारोबारी भाइयों — नितिन संदेसीरा और चेतन संदेसीरा — को कोर्ट ने शर्त रखी है कि यदि वे कुल बकाया रकम का एक-तिहाई हिस्सा चुका दें, तो उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त किया जा सकता है। यह वही संदेसीरा बंधु हैं जिन पर भारतीय बैंकों से करीब 1.6 बिलियन डॉलर की धोखाधड़ी का आरोप है, और जो पिछले कई वर्षों से नाइजीरिया में अपनी बहु-अरब डॉलर की तेल कंपनी चलाते हुए सुरक्षित और आरामदायक जीवन बिता रहे हैं।
यह मामला एक बार फिर इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि संदेसीरा भाइयों ने अदालत में दावा किया था कि वे केवल 570 मिलियन डॉलर यानी लगभग एक-तिहाई भुगतान कर सभी कानूनी कार्यवाहियों से छुटकारा चाहते हैं। उनकी यह पेशकश ऐसे समय में आई है जब भारत में हजारों छोटे कारोबारी और आम नागरिक मामूली क़र्ज़ न चुका पाने के कारण जेल और आर्थिक बर्बादी का सामना कर रहे हैं, जबकि अरबों की धोखाधड़ी करने वाले उद्योगपति विदेशों में अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए ‘सेटलमेंट’ के सहारे बच निकलते हैं। यह निर्णय न सिर्फ बैंकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता पर चोट करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बड़े आर्थिक अपराधों में शामिल शक्तिशाली और प्रभावशाली लोगों के लिए किस तरह एक समानांतर ‘कानून’ काम करता हुआ दिखाई देता है।
संदेसीरा परिवार के खिलाफ दर्ज मामलों की गंभीरता को देखते हुए अदालत का यह रुख कई सवाल खड़ा करता है—क्या भारत में अरबों की ठगी करने वाले सिर्फ रकम का कुछ हिस्सा लौटाकर खुद को कानून की गिरफ्त से बचा सकते हैं? क्या यह आर्थिक अपराधों को प्रोत्साहन देने वाला ख़तरनाक उदाहरण नहीं बन जाएगा? और क्या यह संकेत नहीं देता कि राजनीतिक पहुँच और आर्थिक ताकत रखने वालों के लिए कानून बेहद ‘मुलायम’ हो जाता है? वहीं, यह आरोप भी लंबे समय से उभरते रहे हैं कि संदेसीरा बंधुओं के कुछ लोगों से गहरे राजनीतिक संबंध हैं, जिसके कारण उन पर कार्रवाई वर्षों से ढीली रही है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर देश के नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आम जनता पर कड़े कानून लागू होते हैं, लेकिन अरबों की ठगी करने वालों के लिए ‘मिठास भरे सौदे’ तैयार हो जाते हैं। यह मामला केवल आर्थिक अपराध का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता, शासन की नैतिकता और राजनीतिक-आर्थिक गठजोड़ की गहरी परतों को उजागर करने वाला प्रतीत होता है। जैसे-जैसे संदेसीरा बंधु नाइजीरिया में अपनी तेल कंपनी से अरबों कमाते हुए फल-फूल रहे हैं, भारत के लाखों नागरिक पूछ रहे हैं — आखिर कब तक लुटेरों के लिए ‘सेटलमेंट’, और आम लोगों के लिए ‘सज़ा’ का चलन जारी रहेगा?





