एक समय भारत की बैडमिंटन कोर्ट पर अपनी स्मैश और तेज़ खेल से करोड़ों दिलों को जीतने वाली ज्वाला गुट्टा आज एक अलग ही वजह से सुर्खियों में हैं—ममता के उस रूप के लिए, जिसने ना सिर्फ लोगों को भावुक कर दिया, बल्कि कई नन्हीं जानों को जीने की एक नई उम्मीद दे दी। मां बनने के बाद जब ज्वाला को पता चला कि देश के सरकारी अस्पतालों में कई समय से पहले जन्मे बच्चे, गंभीर रूप से बीमार नवजात और मां से वंचित अनाथ शिशु सिर्फ इस वजह से मौत के मुंह में जा रहे हैं क्योंकि उन्हें “मां का दूध” नहीं मिल पा रहा, तो उनका दिल टूट गया। उन्होंने सिर्फ दुख महसूस नहीं किया, बल्कि एक बड़ा और इंसानियत से भरा निर्णय लिया—अपने दूध को दान करने का।
अपने व्यस्त कार्यक्रम, यात्राओं और मां बनने की जिम्मेदारियों के बीच ज्वाला ने रोज़ चुपचाप दूध निकालकर फ्रीज में स्टोर करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह मात्रा बढ़ती गई और कुछ ही समय में यह 30 लीटर से अधिक हो गई। यह कोई साधारण मात्रा नहीं थी—डॉक्टरों के अनुसार यह लगभग 300 से ज्यादा फीड के बराबर है, यानी इतने दूध से सैकड़ों बार किसी नवजात को जीवन का सबसे जरूरी पोषण दिया जा सकता है। ज्वाला ने बिना किसी प्रचार-प्रसार के यह सारा दूध हैदराबाद के एक सरकारी अस्पताल के NICU (नवजात गहन चिकित्सा इकाई) को दान कर दिया, जहां कई छोटे-छोटे बच्चे हर सांस के लिए संघर्ष कर रहे थे।
अस्पताल के डॉक्टरों ने भावुक होकर बताया कि ज्वाला के दान किए दूध की वजह से कई बच्चों का वजन बढ़ा, उनकी सांसें स्थिर हुईं और उनके शरीर में वह गुलाबी रंग लौट आया, जो स्वस्थ बच्चे की निशानी होता है। कुछ छोटे से शिशुओं ने पहली बार बोतल से दूध पीकर आंखें खोलीं, कुछ ने पहली बार रोने की आवाज़ निकाली। डॉक्टरों ने कहा कि इस दूध ने इन बच्चों को सिर्फ पोषण ही नहीं दिया, बल्कि जीवन दिया—वह जीवन जो शायद बिना इस मदद के संभव नहीं था।
जब मीडिया ने ज्वाला से इस कदम की वजह पूछी, तो उन्होंने बेहद सरल और दिल छू लेने वाला जवाब दिया—“जब तक मेरा दूध बन रहा है, मैं चाहती हूं कि कोई बच्चा भूखा न सोए।” उनकी इस एक पंक्ति ने बतला दिया कि मातृत्व सिर्फ अपने बच्चे तक सीमित नहीं होता, यह भावना उससे कहीं ज्यादा बड़ी होती है। ज्वाला ने सोशल मीडिया पर भी अन्य माताओं से अपील की कि यदि उनके पास भी दूध की अतिरिक्त मात्रा है, तो वे इसे दूध बैंक में दान करें, क्योंकि देश में ऐसे हजारों बच्चे हैं जिनकी जिंदगी दान किए गए दूध पर टिकी है।
ज्वाला गुट्टा ने यह साबित कर दिया कि एक खिलाड़ी सिर्फ मैडल जीतकर ही महान नहीं बनता, बल्कि इंसानियत के मैदान में कदम रखकर वह समाज का असली हीरो बनता है। आज ज्वाला सिर्फ एक बैडमिंटन स्टार नहीं, बल्कि उन सभी बच्चों की “दूसरी मां” बन चुकी हैं, जिन्हें उन्होंने अपने प्रेम और ममता से जीवन दिया। उनका यह कदम भारत में स्तनपान दूध दान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की एक बड़ी शुरुआत है, और शायद आने वाले समय में कई और माताएं उनके इस नेक कदम से प्रेरित होकर आगे बढ़ेंगी।
ज्वाला ने तकनीक, प्रसिद्धि और मंच का उपयोग खुद के लिए नहीं, बल्कि उन मासूमों के लिए किया जो अपने लिए बोल भी नहीं सकते। ऐसी ममता, ऐसी संवेदना और ऐसी इंसानियत देखने को बहुत कम मिलती है। आज पूरा देश दिल से यही कह रहा है—धन्यवाद ज्वाला, आप सच में एक मां हैं, सिर्फ एक बच्चे की नहीं, बल्कि उम्मीद की उन कई नन्हीं साँसों की, जिन्हें आपने बचा लिया।




