नजीब मालिक । नई दिल्ली 22 नवंबर 2025______
तलाक-ए-हसन को लेकर देश में एक नई बहस छिड़ गई है, जहाँ तीन महीनों में तीन अलग-अलग चरणों में दिए जाने वाले इस कुरान-आधारित तलाक मॉडल को लेकर कानूनी, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर तीखे सवाल उठने लगे हैं। ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब तलाक-ए-हसन की वैधता, इसकी एकतरफ़ा प्रकृति, महिलाओं के अधिकारों पर इसका प्रभाव और इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर चर्चा तेज हो गई है। समर्थक इसे सुलह-प्रधान और संतुलित बताते हैं, जबकि विरोधियों का तर्क है कि आधुनिक संवैधानिक मूल्यों और लैंगिक बराबरी की कसौटी पर यह प्रक्रिया कई चुनौतियाँ पेश करती है।
- तलाक-ए-हसन: एक पारंपरिक इस्लामी तलाक प्रणाली पर नई राष्ट्रीय बहस
तलाक-ए-हसन को लेकर देशभर में गहरी बहस जारी है, जहां इस्लाम में प्रचलित यह पारंपरिक, कुरान-आधारित और क्रमिक तलाक प्रणाली एक बार फिर कानूनी और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन गई है। तलाक-ए-हसन वह तरीका है जिसमें पति तीन अलग-अलग महीनों में हर माह एक बार “तलाक” कहकर तलाक की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। इस प्रणाली को इस्लामी न्यायशास्त्र में संतुलित, कम विवादित और सुलह-प्रोत्साहक माना गया है, क्योंकि यह विवाह को अचानक नहीं तोड़ता बल्कि सोच-विचार और रिश्ते को बचाने की संभावनाओं को प्राथमिकता देता है। वहीं, ट्रिपल तलाक — जिसमें एक ही बैठक में तीन बार “तलाक” कहा जाता था — सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2017 में असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है।
- तीन-चरणीय तलाक की संरचना क्यों है महत्वपूर्ण?
तलाक-ए-हसन की मूल आत्मा इसी बात पर आधारित है कि तलाक एक ऐसा निर्णय है जिसे जल्दबाज़ी में नहीं लिया जाना चाहिए। इसलिए यह प्रक्रिया तीन महीनों में फैली हुई है, ताकि पति–पत्नी दोनों को सोचने, शांत होने, बातचीत करने और रिश्ते को सुधारने का पर्याप्त समय मिल सके। कुरान तलाक को अंतिम विकल्प बताता है और सुलह, धैर्य व न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। इसी सिद्धांत पर तलाक-ए-हसन की तीन-चरणीय संरचना तैयार की गई, जो न सिर्फ विवाह को तुरंत टूटने से रोकती है बल्कि रिश्तों को बचाने का सचेत प्रयास भी करती है।
- पहला उच्चारण — रिश्ते को बचाने का पहला अवसर
तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया का पहला चरण पत्नी की तहर अवस्था में शुरू होता है, जब पति एक बार “तलाक” कहता है। इस पहले उच्चारण के बाद भी तलाक तुरंत प्रभावी नहीं होता और इसे पति द्वारा वापस लिया जा सकता है। यदि इस बीच पति सुलह कर ले या दांपत्य संबंध बहाल हो जाएं, तो पूरा तलाक स्वतः समाप्त माना जाता है। इस अवधि में पति का पत्नी का भरण-पोषण जारी रखना धार्मिक और कानूनी दायित्व है, जिससे सुनिश्चित किया जाता है कि तलाक का निर्णय भावनात्मक अस्थिरता में न लिया जाए।
- इद्दत: सुलह और आत्मचिंतन का एक महीना
पहले उच्चारण के बाद शुरू होती है लगभग 30 दिनों की इद्दत अवधि, जिसका मूल उद्देश्य पति–पत्नी दोनों को सुलह का वास्तविक और व्यावहारिक अवसर देना है। यह समय ऐसा होता है जब परिवार, समाज और सलाहकार भी बीच में पड़कर misunderstanding दूर करने की कोशिश करते हैं। यदि इस अवधि में पति तलाक वापस लेने की इच्छा जताए या दांपत्य संबंध स्थापित हो जाएं, तो तलाक समाप्त हो जाता है और विवाह अपने मूल रूप में बहाल माना जाता है। यह अवधि तलाक-ए-हसन की संरचना को मानवीय और संतुलित बनाती है।
- दूसरा उच्चारण — एक और मौका, एक और महीना
यदि पहले महीने में सुलह नहीं होती, तो दूसरे महीने में पति दूसरी बार “तलाक” कहता है। यह दूसरा उच्चारण भी revocable यानी वापस लिया जा सकने वाला होता है। इसके बाद शुरू होता है एक और पूरा महीना, जो दोनों पक्षों को पुनर्विचार, संवाद और समाधान की संभावनाओं को तलाशने का एक और अवसर देता है। तलाक की यह प्रक्रिया स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि इस्लामी कानून तलाक को अंतिम और जल्दबाज़ी का निर्णय नहीं मानता।
- तीसरा उच्चारण — विवाह का अंतिम और अपरिवर्तनीय अंत
यदि दो महीनों की प्रक्रिया के बाद भी सुलह नहीं हो पाती, तो तीसरे महीने पति तीसरी बार “तलाक” कहता है और यही वह क्षण होता है जब तलाक irrevocable यानी अंतिम रूप से वैध हो जाता है। अब विवाह कानूनी और धार्मिक रूप से समाप्त माना जाता है और दोनों की ज़िंदगी नए मार्ग पर आगे बढ़ती है। तीन महीनों की यह संरचना तलाक को एक गंभीर, सोचा-समझा और क्रमिक निर्णय बनाती है, जो पर्सनल लॉ में संतुलन और संवेदनशीलता दोनों को दर्शाती है।
- महिलाओं के तलाक अधिकार — खुला और फस्ख
इस्लाम में तलाक सिर्फ पुरुष का अधिकार नहीं है; महिलाओं को भी तलाक लेने के दो प्रमुख विकल्प मिलते हैं—खुला और फस्ख। खुला के तहत महिला मेहर का कुछ हिस्सा वापस करके तलाक मांग सकती है, जबकि फस्ख के माध्यम से वह घरेलू हिंसा, क्रूरता, भरण-पोषण न मिलना या अन्य वैध कारणों से अदालत में विवाह निरस्त करा सकती है। यह अधिकार महिलाओं को वैवाहिक शोषण या अन्यायपूर्ण स्थिति से निकलने का संवैधानिक और शरई रास्ता प्रदान करते हैं।
- तलाक के बाद महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा
तलाक-ए-हसन के अंत के बाद महिला को पूरा मेहर, इद्दत अवधि का भरण-पोषण और बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण अधिकार मिलते हैं। यदि महिला गर्भवती हो, तो उसका भरण-पोषण बच्चे के जन्म तक पति की अनिवार्य जिम्मेदारी होती है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि महिला आर्थिक असुरक्षा या सामाजिक दबाव का सामना न करे और उसके अधिकार सुरक्षित रहें।
- कुरान में तलाक-ए-हसन की धार्मिक नींव
तलाक-ए-हसन की पूरी संरचना कुरान की सूरह अल-बकराह (2:226–237) और सूरह अत-तलाक (65:1–6) में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित है। इन आयतों में तलाक को अंतिम विकल्प बताते हुए समय, धैर्य और सुलह को प्राथमिकता दी गई है। कुरान तलाक को हल्के में लेने से मना करता है और इसे न्यायसंगत, शांत और मननशील प्रक्रिया के रूप में लागू करने का आदेश देता है। तलाक-ए-हसन इन्हीं शिक्षाओं का व्यावहारिक रूप माना जाता है।
- भारत में तलाक-ए-हसन की कानूनी स्थिति: पूरी तरह वैध
भारत में तलाक-ए-हसन 2019 के मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज) एक्ट के बाद भी पूरी तरह वैध है, क्योंकि यह कानून सिर्फ ‘तलाक-ए-बिद्दत’ यानी एक बैठक में तीन तलाक को अपराध घोषित करता है। तलाक-ए-हसन की क्रमिक, सोच-समझकर और सुलह-आधारित प्रकृति के कारण यह महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध नहीं माना जाता और अब तक किसी कानून द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया गया है।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती — 2025 की संवैधानिक कसौटी
2025 तक सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएँ लंबित हैं, जिनमें तर्क दिया गया है कि तलाक-ए-हसन पुरुष को एकतरफा अधिकार देता है और संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे ट्रिपल तलाक की तरह मनमाना नहीं माना, लेकिन यह स्पष्ट किया कि प्रक्रिया का दुरुपयोग जैसे वकील के नोटिस या मेसेज के माध्यम से तलाक देना स्वीकार्य नहीं होगा। अदालत का रुख धार्मिक प्रथा में अनुशासन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
- तलाक-ए-हसन बनाम ट्रिपल तलाक: अंतर और न्यायसंगतता
जहाँ ट्रिपल तलाक एकतरफा, तात्कालिक और मनमाना था, वहीं तलाक-ए-हसन तीन महीनों में फैला हुआ एक क्रमिक मॉडल है, जिसमें सुलह के कई अवसर मिलते हैं और शुरुआती दो उच्चारण रद्द भी किए जा सकते हैं। इसीलिए विद्वान इसे तुलनात्मक रूप से अधिक न्यायसंगत, संतुलित और कुरान-सम्मत प्रक्रिया मानते हैं, जो जल्दबाज़ी की जगह विचार, विवेक और पुनर्विचार पर आधारित है।




