महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 18 नवंबर 2025
बांग्लादेश में जिस दृश्य ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा, वह सिर्फ़ एक गिरफ्तारी का दृश्य नहीं था—बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे की जड़ से उठी वह कांपती हुई चीख थी जिसकी आवाज़ पूरे दक्षिण एशिया में गूंज उठी। पुलिस ने चुनाव में धांधली के आरोपों में फंसे देश के पूर्व चुनाव आयुक्त को हिंसक प्रदर्शन और जनरोष से बचाने के लिए एंटी-रायट हेलमेट पहनाकर भीड़ के बीच से निकाला। चारों तरफ पुलिस की हिरासत, बीच में एक व्यक्ति जिसे कभी चुनाव की पवित्र प्रक्रिया की रक्षा करने वाला माना जाता था—और आज उसी पर आरोप है कि उसने लोकतंत्र को अपने निजी, राजनीतिक और प्रशासनिक हितों के लिए गिरवी रख दिया। यह दृश्य याद दिलाता है कि लोकतंत्र किसी पद, किसी संस्था, किसी चेहरे या किसी सत्ता का नहीं—बल्कि जनता की सामूहिक न्याय–व्यवस्था का नाम है, जो देर से ही सही, लेकिन अपना हिसाब ज़रूर करती है।
जवाबदेही—लोकतंत्र का वह हथियार जो किसी भी सत्ता से बड़ा होता है, चाहे वह कितनी भी मजबूत क्यों न हो
यह घटना हमें यह भी याद दिलाती है कि लोकतंत्र में सत्ता का असली अर्थ “कुर्सी” नहीं बल्कि “जिम्मेदारी” होता है। बांग्लादेश में वर्षों से चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे थे। तमाम आरोपों को सत्ता ने नज़रअंदाज़ किया, एक समय तो लोगों को लगा कि शायद कोई कार्रवाई कभी नहीं होगी। लेकिन लोकतंत्र का पहिया धीरे चलता है, पर न्याय के क्षण पर आकर वह तेजी से पलटता है। आज वही चुनाव आयुक्त, जो कल तक अपनी शक्ति और पद के प्रभाव में था, आज अपने ही फैसलों के बोझ से दबकर कानून के सामने खड़ा है। यह तस्वीर पूरी दुनिया को समझाती है कि लोकतंत्र में चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न बन जाए—जब जनता का न्याय मांगने का समय आता है, तब सबसे ऊँचे पद भी धराशायी हो जाते हैं, और शक्ति का कवच एक पल में टूट जाता है।
भारत के लिए यह सिर्फ़ एक विदेशी खबर नहीं—यह एक चेतावनी, एक दर्पण और एक भविष्य की परछाईं है
अब सवाल यह है कि भारत में इस घटना का संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है? क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत की चुनावी प्रक्रियाओं पर जिस प्रकार के व्यवस्थित और गंभीर आरोप लगते रहे हैं—वोटर लिस्ट से नाम गायब होना, SIR प्रक्रिया में व्यापक अनियमितताओं का आरोप, चुनाव आयोग की तटस्थता पर सवाल, चुनावी प्रबंधन की समय-सारिणी में पक्षपात की शिकायतें—इन सबने लोकतांत्रिक संरचना पर जनता का भरोसा हिलाया है। जब भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मतदाता सूची जैसे बुनियादी स्तर पर भी घपले, जल्दबाजी और अस्पष्टता दिखती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यहाँ की संस्थाएँ “हमेशा के लिए जवाबदेही से ऊपर” हैं? क्या यहाँ कोई ऐसा दिन आ पाएगा जब यदि चुनाव आयोग या उससे जुड़े लोग किसी गलत प्रक्रिया में शामिल पाए जाएँ, तो उन्हें भी वही जवाब देना पड़ेगा जो बांग्लादेश में देना पड़ा?
समय की विडंबना—शक्ति हमेशा अस्थायी और जवाबदेही हमेशा स्थायी होती है
इतिहास के लंबे गलियारों में सत्ता की दास्तानें कई बार बदली हैं, लेकिन एक चीज़ कभी नहीं बदली—जवाबदेही का नियम। लोग बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, पर लोकतंत्र का न्याय बदलता नहीं। जो लोग आज स्वयं को सर्वशक्तिमान समझते हैं, जो मानते हैं कि वे किसी भी संस्थागत सीमा से ऊपर हैं, वे भूल जाते हैं कि समय का पहिया एक दिन उन पर भी घूमकर आता है। बांग्लादेश का पूर्व चुनाव आयुक्त भी कभी यही सोचता होगा कि उसके खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ दब जाएगी, लेकिन आज उसकी गिरफ्तारी साबित कर रही है कि लोकतंत्र चाहे छोटे देश में हो या बड़े में—उसका मूल नियम वही है: “किसने क्या किया, क्यों किया—इस प्रश्न से कोई नहीं बच सकता।”
यह वही क्षण है जब सत्ता की चकाचौंध भी फीकी पड़ जाती है और न्याय की रौशनी सबसे तेज़ चमकती है।
“उस दिन न कुर्सी बचाती है, और न चुप्पी”—जवाबदेही का क्षण जब आता है, सारी ढालें टूट जाती हैं
जब सत्ता का दुरुपयोग चरम पर होता है, तो एक भ्रम पैदा हो जाता है कि संस्थाएँ कभी सवाल नहीं पूछेंगी और सिस्टम कभी जवाब नहीं मांगेगा। लेकिन इतिहास बताता है कि जब लोकतांत्रिक सिस्टम का सब्र टूटता है, तो वह सबसे ऊँची कुर्सियों को भी कटघरे में खड़ा कर देता है। बांग्लादेश की यह घटना ठीक यही संदेश दे रही है।
और यही संदेश भारत के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
कि जब लोकतंत्र जवाब मांगने निकलता है,
तब न कुर्सी बचती है,
न शक्ति बचती है,
न संपर्क बचते हैं,
और न ही चुप्पी।
सवाल यह नहीं कि भारत में यह होगा या नहीं। सवाल यह है कि कब होगा। और यह भी कि क्या संस्थाएँ स्वयं को जवाबदेह बनाएंगी या जवाबदेही लोगों द्वारा उन पर थोपी जाएगी।
“बूझे अज्ञानेश???” — यह प्रश्न किसी व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए है
यह तंज किसी एक नेता या संस्था के लिए नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम के लिए है जो यह मानने की भूल करता है कि वह जनता की नज़रों से छिपा रह सकता है। बांग्लादेश का दृश्य आज दक्षिण एशिया का आईना बन चुका है। अब समय है भारत में भी यह पूछने का— क्या हमारे लोकतंत्र में वह साहस है कि एक दिन चुनावी प्रक्रियाओं में हुई गलती या गड़बड़ी पर कड़ी कार्रवाई कर सके? क्या यहाँ भी सत्ता पर बैठे लोग कभी कानून के सामने उसी तरह खड़े होंगे जैसे बांग्लादेश का चुनाव आयुक्त खड़ा है? अगर लोकतंत्र है—तो जवाबदेही भी आएगी। समय आएगा। बस इंतज़ार इतना ही है कि कब।




