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आज़म–अब्दुल्ला को सज़ा, स्मृति पर सन्नाटा—क्या कानून दोहरा चेहरा दिखा रहा है?

अनिल यादव | लखनऊ 18 नवंबर 2025

दोहरे मापदंड का सवाल

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आज़म खान तथा उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म को दो PAN नंबर रखने के आरोप में सात साल की कठोर सजा सुनाई गई है। अदालत के इस फैसले ने एक बार फिर देश की राजनीति और न्याय-प्रणाली को लेकर तीखी चर्चाओं को हवा दे दी है। सजा के बाद राजनीतिक गलियारों में ये बहस तेज हो गई है कि आखिर क्या देश का कानून हर व्यक्ति के लिए समान रूप से लागू होता है या फिर राजनीतिक पहचान और सत्ता के निकटता के आधार पर कानून का रवैया बदल जाता है? आज़म खान के खिलाफ पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से एक के बाद एक कानूनी कार्रवाइयाँ हुई हैं, उसे विपक्ष लगातार “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” के रूप में पेश कर रहा है। उनके समर्थकों का कहना है कि कानून का इस्तेमाल विपक्ष को खत्म करने के हथियार की तरह किया जा रहा है।

स्मृति ईरानी के दो PAN नंबर पर कार्रवाई शून्य

यह भी याद दिलाया जा रहा है कि वर्ष 2015 में भाजपा की वरिष्ठ नेता और वर्तमान केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ भी इसी तरह का आरोप खुलकर सामने आया था। उस समय सार्वजनिक दस्तावेजों में दो अलग-अलग PAN नंबर सामने आए थे, जिसके बाद देश की राजनीति में बड़ा हंगामा हुआ था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उस मामले में न तो किसी जांच एजेंसी ने कोई कदम उठाया, न कोई FIR हुई, न समन जारी हुआ—और न ही किसी स्तर पर कोई कार्रवाई की चर्चा सामने आई। वर्षों बीत गए, सरकारें बदलीं, पर मामला ज्यों का त्यों ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। यह खामोशी अब और ज्यादा तीखी लगने लगी है क्योंकि ठीक उसी आरोप पर, एक दूसरे नेता को सज़ा और जेल का सामना करना पड़ रहा है। यही दोहरा व्यवहार अब देश में कानून की निष्पक्षता पर गहरे सवाल खड़ा करता है।

 राजनीतिक पहचान तय करती है कार्रवाई की दिशा?

देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पहचान यह है कि कानून सबके लिए समान हो—लेकिन हालिया घटनाओं ने इस दावे की विश्वसनीयता को संदेहों के घेरे में ला दिया है। जब एक ही आरोप पर एक नेता पर तुरंत मुकदमा चलता है, त्वरित जांच होती है, गिरफ्तारी होती है और सजा सुनाई जाती है, जबकि दूसरे नेता, जिनका मामला पहले सामने आया था, उन पर वर्षों तक कोई कार्रवाई तक नहीं होती—तो यह स्वाभाविक है कि जनता सवाल पूछेगी। लोकतंत्र में सिर्फ न्याय होना ही नहीं, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी जरूरी होता है। जब जनता यह महसूस करने लगती है कि कानून सत्ता के विरोधियों पर सख्त और सत्ता के निकट लोगों पर नरम हो जाता है, तो इससे न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ता है।

राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा होगा

ऐसे मामलों में दोहरे मापदंडों का आरोप सिर्फ विपक्ष का राजनीतिक बयान नहीं होता, बल्कि जनता के मानस में गहरे उतरने वाला सवाल बन जाता है। इससे कानून की विश्वसनीयता, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और न्याय-व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर असर पड़ता है। जब एक ओर आज़म खान जैसा नेता सैकड़ों मुकदमों, लगातार छापों और अदालतों के चक्कर में उलझा रहता है, और दूसरी ओर स्मृति ईरानी जैसी प्रभावशाली और सत्ता-समीप नेता पर पूरी तरह से चुप्पी साध ली जाती है, तो यह कानून के सामने “समानता” के मूल सिद्धांत को हिला देता है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि न्याय सब तक पहुँचे, चाहे वह विपक्ष का नेता हो, सत्ताधारी दल का मंत्री हो या आम नागरिक।

 कानून चेहरे देखकर नहीं, अपराध देखकर हो

यह बहस आज सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि देश के न्यायिक ढांचे की आत्मा से जुड़ा सवाल बन चुकी है। यदि देश को कानून के शासन (Rule of Law) पर खड़ा रहना है, तो कानून को व्यक्ति, पद, पार्टी या प्रभाव नहीं, बल्कि तथ्य और सत्य के आधार पर कार्रवाई करनी होगी। आज़म खान और उनके बेटे की सजा एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है—पर इसे सही और निष्पक्ष तभी कहा जा सकता है जब वही पैमाना उन सभी पर लागू हो जिन पर यही आरोप लगे हों। स्मृति ईरानी का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि हमारी प्रणाली में किस तरह ‘सिलेक्टिव एक्शन’ की छाया दिखाई देती है। आखिर कब तक देश ऐसे विरोधाभासों को अनदेखा करता रहेगा? कब तक कानून दो अलग-अलग लोगों पर दो अलग-अलग तरह से लागू होता रहेगा? न्याय तभी सशक्त कहलाएगा जब वह निष्पक्ष, बराबरी वाला और बिना राजनीतिक प्रभाव के होगा।

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