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भारत का बैंकिंग सेक्टर खतरे की कगार पर: कॉर्पोरेट लोन की लूट और रिटेल डिफॉल्ट की सुनामी—क्या मर्जर सिर्फ धोखा है?

सुनील कुमार  | नई दिल्ली 17 नवंबर 2025

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र एक बार फिर उसी संकट की दहलीज पर खड़ा है, जिसने 2010 के दशक में पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हिला दी थी। फर्क बस इतना है कि इस बार बीमारी और भी खतरनाक है—क्योंकि इसमें कॉर्पोरेट और रिटेल, दोनों मोर्चों पर जंग छिड़ चुकी है। आरबीआई की सितंबर 2024 की रिपोर्ट कहती है कि कुल एनपीए 12 साल के न्यूनतम 2.6% पर हैं—यह सुनने में राहत जैसा लगता है, लेकिन यह आधा सच है। असली संकट अनसिक्योर्ड पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड सेक्टर में उभर रहा है, जहां डिफॉल्ट का पहाड़ तेजी से खड़ा हो रहा है और नया एनपीए का 52% हिस्सा अकेले रिटेल अनसिक्योर्ड लोन का है। यानी बहार से बैंकिंग सिस्टम साफ-सुथरा दिखाई देता है, लेकिन भीतर विस्फोटक भरा है।

फिच रेटिंग्स ने जनवरी 2025 में चेतावनी दी कि अनसिक्योर्ड रिटेल लोन भारतीय बैंकों के “एसेट क्वालिटी” को 2025 में सबसे ज्यादा चोट पहुँचाएंगे। उसी तरह एस एंड पी ग्लोबल का जुलाई 2025 का अनुमान कहता है कि मार्च 2026 तक ग्रॉस एनपीए बढ़कर 3.3% तक जा सकता है। यह एक छोटा बढ़ाव नहीं है—यह एक संकेत है कि डायग्नोसिस गलत था और बीमारी गहराई में है। आर्थिक सर्वे 2025 भी साफ चेतावनी देता है: वैश्विक अस्थिरता, अमेरिकी बाज़ार में किसी भी गिरावट, और घरेलू बेरोज़गारी का असर भारतीय बैंकिंग सिस्टम पर सीधा पड़ने वाला है।

इसमें एक और खतरा जुड़ रहा है—लोन ग्रोथ का तेज़ी से गिरना। 2024-25 में जहां लोन ग्रोथ 22.5% था, वहीं 2025-26 में इसके 12.3% पर सिमटने की आशंका है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं; यह संकेत है कि बैंक जोखिम लेने से डर रहे हैं, और उपभोक्ता आर्थिक मंदी को महसूस कर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में कॉर्पोरेट लोन का पुराना संकट—जो 2010 के बाद 11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा—भी अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है।

अनसिक्योर्ड लोन: वह टाइम बम जो हर बैंक की बैलेंस शीट के नीचे छिपा है

भारत में रिटेल लेंडिंग का सबसे तेजी से बढ़ता क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड रहा है। लेकिन अब इसी क्षेत्र ने खतरे की घंटी बजा दी है। मार्च 2016 में अनसिक्योर्ड लोन का हिस्सा 18% था, जो मार्च 2024 में 25.3% हो गया। यह बढ़ोतरी uncontrolled lending का परिणाम है।

आरबीआई की 2024 की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट बताती है कि पर्सनल लोन लेने वालों में से आधे के पास पहले से होम/व्हीकल जैसे सिक्योर्ड लोन हैं। यानी लोग ओवर-लिवरेज्ड हैं—जितनी आय है उससे अधिक कर्ज लेकर खर्च कर रहे हैं। यही कारण है कि बजाज फाइनेंस के एमडी राजीव जैन तक को यह मानना पड़ा कि निचले आय वर्ग के लोग तीन-तीन पर्सनल लोन ले रहे हैं। यह स्थिति अमेरिका की 2008 की सब-प्राइम क्राइसिस की याद दिलाती है।

नवंबर 2024 में आरबीआई को अनसिक्योर्ड लोन पर रिस्क-वेट 25% बढ़ाना पड़ा। यह सीधा इशारा है कि बैंक जिस रास्ते पर जा रहे थे, वह असुरक्षित और जोखिम भरा था। लेकिन बहुत देर हो चुकी है—मिड-2025 तक डिफॉल्ट ऊंचे रहने की चेतावनी प्राइवेट बैंकों ने खुद रॉयटर्स को दी है।

कॉर्पोरेट लोन का पुराना जख्म फिर हरा हो रहा है

भारत में कुल एनपीए में 90% योगदान कॉर्पोरेट लोन का है। 2000-2008 के बूम पीरियड में बांटे गए लोन आज भी बैंकों की बैलेंस शीट पर बोझ की तरह लटके हुए हैं। IBC 2016 ने कुछ सुधार किए, लेकिन रिकवरी रेट अभी भी 30-40% पर अटका है—जो बेहद खराब माना जाता है। इससे साफ है कि मूल समस्या—गवर्नेंस की कमी, प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग की कमजोरी, और बैंकिंग सेक्टर में राजनीतिक हस्तक्षेप—अभी भी जस की तस है।

सरकार का मर्जर प्लान: समाधान कम, ऑप्टिकल इलाज ज़्यादा

जैसे ही संकट गहरा होता दिखा, सरकार ने एक पुराना नुस्खा निकाला—बैंकों का mega-merger। अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार छोटे बैंकों जैसे IOB, CBI, BOI, BOM को SBI, PNB और BOB जैसे बैंकों में मिलाकर कुल पब्लिक सेक्टर बैंकों की संख्या 12 से घटाकर 4 कर देना चाहती है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत को बड़े बैंकों की जरूरत है। यह तर्क फौरी तौर पर ठीक लगता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या बड़े बैंक = मजबूत बैंक? 2019 के मर्जर का अनुभव कहता है—नहीं।

जुलाई 2022 के वर्किंग पेपर में साफ कहा गया कि मर्जर से एनपीए इसलिए कम दिखा क्योंकि कैपिटल पूल बड़ा हो गया, न कि क्योंकि डिफॉल्टर्स ने पैसा लौटाया। यानी यह cosmetic surgery है।

उदाहरण के लिए—

यूनियन बैंक + बैंक ऑफ इंडिया = 25.67 लाख करोड़ एसेट बेस। यह ICICI के बराबर होगा। लेकिन अगर इसमें दोनों बैंकों का NPA भी जोड़ दिया गया, तो यह एसेट बेस एक “कम्पैक्ट कचरा डिपो” जैसा बन जाएगा—जहां कचरा तो ज्यादा है, बस ढांचा बड़ा कर दिया गया है।

मर्जर के खतरे: नौकरियां जाएंगी, ग्रामीण बैंकिंग सिकुड़ेगी, और NPA वहीं रहेगा

बैंकिंग कर्मचारी यूनियनों ने सही अंदेशा जताया है—बड़ा मर्जर मतलब बड़ी छंटनी। ब्रांच रेशनलाइजेशन से ग्रामीण बैंकिंग पर गहरा असर पड़ेगा। जहां पहले दो बैंक थे, अब एक होगा—और कौन सा? वही जो कम लागत पर चले। यानी ग्रामीण ग्राहक फिर से उपेक्षित।

इसके अलावा NARCL, जिसे Bad Bank कहा जा रहा था, दो साल में सिर्फ 21,350 करोड़ के एनपीए खरीद पाया—लक्ष्य था 50,000 करोड़। यानी मर्जर को मजबूत बनाने वाला कोई गहरा ढांचा मौजूद नहीं है।

क्या मर्जर एनपीए का इलाज है? नहीं। यह सिर्फ सॉल्वेंसी को अच्छा दिखाने का तरीका है। बैंकिंग विशेषज्ञों से लेकर नीति आयोग तक यह बात दोहरा चुके हैं—

एनपीए समस्या का समाधान है:

  • बेहतर प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग
  • कॉर्पोरेट गवर्नेंस
  • डिजिटल फ्रॉड डिटेक्शन
  • डेटा-बेस्ड क्रेडिट अंडरराइटिंग
  • समयबद्ध IBC रिकवरी

लेकिन इन सबको छोड़कर सरकार मर्जर पर जोर दे रही है—क्योंकि इससे एक लाभ होता है: बैंक मजबूत दिखते हैं, भले ही वे वास्तव में न हुए हों।

बैंकिंग सेक्टर की आग धधक रही है, और मर्जर सिर्फ राख झाड़ने जैसा है। भारतीय बैंकिंग सिस्टम दो खतरों की गिरफ्त में है— कॉर्पोरेट लोन का पुराना ज्वालामुखी और अनसिक्योर्ड लोन का नया विस्फोट। दोनों मिलकर बैलेंस शीट को कमजोर कर रहे हैं। ऐसे में मर्जर किसी भी रूप में समाधान नहीं, बल्कि एक बहाना है—एक ऑप्टिकल मास्क, जो समस्या को छुपाता है, हल नहीं करता।

यदि क्रेडिट अंडरराइटिंग, कॉर्पोरेट जवाबदेही, और वित्तीय गवर्नेंस पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यह संकट भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास गति को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। बड़े बैंक बनाना आसान है; मजबूत बैंक बनाना मुश्किल। सरकार अभी सिर्फ आसान रास्ता चुन रही है।

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