नई दिल्ली, 3 जुलाई 2025 —
देश की प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक कंपनी डाबर इंडिया लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि आयुर्वेद और बाबा रामदेव को डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ भ्रामक, अपमानजनक और तुलनात्मक विज्ञापन प्रसारित करने से सख्त मना कर दिया है। अदालत ने पाया कि पतंजलि द्वारा जारी टीवी विज्ञापन उपभोक्ताओं को गुमराह करते हैं और डाबर जैसे भरोसेमंद ब्रांड की छवि को जानबूझकर नुकसान पहुंचाते हैं। डाबर ने अपनी याचिका में कहा था कि पतंजलि ने गलत दावे कर यह संकेत दिया कि डाबर च्यवनप्राश बच्चों के लिए असुरक्षित है, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है।
विवादित विज्ञापन में पतंजलि ने यह दावा किया कि उनके च्यवनप्राश में 51 से अधिक जड़ी-बूटियाँ हैं और उसमें शुद्धता व गुणवत्ता अधिक है, जबकि डाबर के उत्पाद को केवल “शहद और चीनी” का मिश्रण बताया गया। विज्ञापन में एक काल्पनिक मां को अपने बच्चे को डाबर नहीं देने की सलाह देते दिखाया गया, जिससे यह भ्रम फैलता है कि डाबर का उत्पाद बच्चों के लिए ठीक नहीं। डाबर ने अदालत में इसे पूरी तरह झूठा, गुमराह करने वाला और प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाला बताया। अदालत ने डाबर की दलीलों को सही ठहराया और पतंजलि को ऐसे सभी विज्ञापन तुरंत बंद करने का आदेश दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति मिनी पुष्करना ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी प्रतिस्पर्धी ब्रांड को नीचा दिखाकर अपना उत्पाद बढ़ावा देना न केवल अनैतिक है बल्कि बाजार में अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है। डाबर जैसी 135 वर्षों से उपभोक्ताओं के विश्वास पर खड़ी कंपनी को इस तरह लक्षित करना ब्रांड मूल्यों का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य से जुड़े उत्पादों में उपभोक्ताओं को भ्रमित करना समाजहित के खिलाफ है। कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई 14 जुलाई को तय की है।
महत्वपूर्ण बात है कि यह वही पतंजलि है जिसे कोरोना महामारी के दौरान ‘कोरोनिल’ नामक दवा को लेकर भ्रामक दावों पर देशव्यापी आलोचना झेलनी पड़ी थी। जब दवा को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा प्रमाणित बताकर प्रचार किया गया, तब केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया कि ऐसा कोई प्रमाणन नहीं दिया गया था। इसके बाद पतंजलि ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर माफी माँगी थी और माना था कि उनसे प्रचार में “भूल” हुई है। अब डाबर के खिलाफ भी झूठे दावे करके लाभ कमाने की कोशिश को अदालत ने गंभीरता से लिया है और एक बार फिर रामदेव और उsनकी कंपनी को न्यायिक सीमा में रहने की सख्त हिदायत दी है। यह फैसला बाज़ार में पारदर्शिता और नैतिक प्रतिस्पर्धा की दिशा में एक मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है।




