देश की राजनीति में इस समय एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ ने जबरदस्त हलचल मचा दी है। विपक्षी दलों ने RSS के 100 वर्षीय इतिहास पर बड़ा हमला करते हुए दावा किया है कि संगठन ने न सिर्फ राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन और भारत के संविधान का भी लगातार विरोध किया। यह विवाद उस समय और तीखा हो गया जब 24 फरवरी 1948 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा लिखी गई एक आधिकारिक चिट्ठी फिर से सार्वजनिक बहस का केंद्र बन गई है। यह पत्र पंजाब के मुख्य सचिव को लिखा गया था, जिसमें स्पष्ट रूप से दर्ज है कि RSS के स्वयंसेवकों ने तिरंगे का अपमान किया और नवस्वतंत्र भारत में स्थापित की जा रही संवैधानिक व्यवस्था की अनदेखी की।
यह पत्र स्वतंत्रता के तुरंत बाद के उस दौर की याद दिलाता है जब देश विभाजन के घावों से उबर रहा था और नई सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों को सुदृढ़ करने में लगी हुई थी। दस्तावेज़ के अनुसार, RSS के कुछ समूहों ने सरकारी आदेश के बावजूद राष्ट्रीय ध्वज को फहराने से इंकार कर दिया और सार्वजनिक रूप से तिरंगे के सम्मान को चुनौती दी। विपक्ष का कहना है कि यह घटना संघ के उस लंबे इतिहास का प्रमाण है जिसमें उसने न सिर्फ आज़ादी के आंदोलन में दूरी बनाए रखी, बल्कि लगातार देश के बुनियादी मूल्यों के विपरीत रुख अपनाया। विपक्ष ने इसे “100 साल का राष्ट्र-विरोधी ट्रैक रिकॉर्ड” बताते हुए बीजेपी और संघ पर तीखा हमला बोला है।
विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि RSS की विचारधारा शुरू से ही संविधान के सिद्धांतों के साथ मेल नहीं खाती रही। कहा जा रहा है कि संघ ने न तो स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, न संविधान सभा का समर्थन किया, और कई मौकों पर देश के राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करने का इतिहास भी रहा है। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि आज जबकि BJP स्वयं को राष्ट्रभक्ति का केंद्र बताती है, उस समय संघ से जुड़े ये दस्तावेज़ सत्ता पक्ष के दावों को कमजोर करते हैं। विपक्ष का कहना है कि BJP चाहे जितना प्रयास कर ले, RSS के इतिहास को ‘साफ़’ या ‘मीठा’ नहीं बनाया जा सकता क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड इसकी असलियत सामने रखते हैं।
यह मुद्दा अब चुनावी राजनीति और वैचारिक टकराव का बड़ा विषय बन चुका है। विपक्ष का कहना है कि देश के युवाओं और भाजपा-संघ के समर्थकों को “RSS का वास्तविक इतिहास” जानना चाहिए—वह इतिहास जिसमें तिरंगे के सम्मान का अभाव है, संविधान के प्रति असहमति है और स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी है। जैसे-जैसे यह दस्तावेज़ और इससे जुड़े आरोप देशभर में चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं, यह देखा जाना बाकी है कि संघ और भाजपा इस गंभीर चुनौती का जवाब कैसे देते हैं, और क्या यह विवाद आने वाले राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करेगा।





